भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 356 में से

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114 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे


[वाम भाग / Left Column]

अपामार्ग (चिरचिटा) के बीजों का कल्क चावलों के धोवन में मिलाकर पीने से 'रक्तार्श' (खूनी बवासीर) नष्ट होता है। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। वक्तव्य— रक्तार्श में अपामार्ग की जड़ का भी प्रयोग इसी प्रकार किया जाता है।

बदरीमूल कल्क बदरीमूलकल्केन तिलकल्कश्च योजितः। मधुक्षीरयुतः कुर्याद् रक्तातीसारनाशनः॥२०॥ बेरी की जड़ की छाल का कल्क और तिल का कल्क दोनों को मिलाकर शहद तथा दूध में मिलाकर पीने से रक्तातिसार (खून के दस्तों) को नष्ट करता है। वक्तव्य— यथासम्भव यहाँ झड़बेरी की जड़ का ही उपयोग करना चाहिये।

लाक्षा कल्क कूष्माण्डकरसोपेतां लाक्षां कर्षद्वयं पिबेत्। रक्तक्षयमुरोघातं क्षयरोगं च नाशयेत्॥२१॥ लाक्षा (लाही या लाख) का कल्क दो तोला चौगुने कोहड़ा के पानी में मिलाकर पियें। इससे रक्तक्षय (रक्त का जाना या घटना) उरोघात (छाती का भीतरी घाव) तथा क्षयरोग (यक्ष्मा) का नाश हो जाता है। वक्तव्य— यह उत्तम योग है। लाही या लाख पीपल अथवा बेरी की लेनी चाहिये। उपयोग में लाने से पहले लाख को साफ सुथरी कर लेना चाहिये।

तण्डुलीय कल्क तण्डुलीयजटाकल्कः सक्षौद्रः सरसाञ्जनः। तण्डुलोदकसम्पीतो रक्तप्रदरनाशनः॥२२॥ चौलाई की जड़ का कल्क मधु और रसौत (3-4 माशा) मिलाकर चावलों के धोवन के साथ पीने से 'रक्तप्रदर' नष्ट होता है।

अङ्कोट कल्क अङ्कोटमूलकल्कश्च सक्षौद्रस्तण्डुलाम्बुना। अतीसारहरः प्रोक्तस्तथा विषहरः स्मृतः॥२३॥ अंकोट के जड़ की छाल का कल्क मधु मिलाकर चावलों के धोवन के साथ पीने से अतिसार तथा विष-विकार को हरता है।


[दक्षिण भाग / Right Column]

वक्तव्य— अंकोट को 'अंकोल' तथा ढेरा भी कहा जाता है।

वन्ध्याकर्कोटिकादि कल्क वन्ध्याकर्कोटकामूलं पाटलाया जटाऽथवा। घृतेन बिल्वमूलं वा द्विविधं नाशयेद् विषम्॥२४॥ बाँझककोड़ा (खेखसा) की अथवा पाढल की अथवा बेल की जड़ का कल्क घी मिलाकर सेवन करने से दोनों प्रकार (स्थावर और जंगम) के विषों को नष्ट करता है।

अभयादि कल्क अभयासैन्धवकणाशुण्ठीकल्कस्त्रिदोषहा । पथ्यासैन्धवशुण्ठीभिः कल्को दीपनपाचनः॥२५॥ बड़ी हरड़, सेंधा नमक, पीपल तथा सोंठ का जल डालकर पीसा गया कल्क त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) के विकारों को नष्ट करता है। बड़ी हरड़, सेंधा नमक और सोंठ का कल्क दीपन (अग्निवर्द्धक) तथा पाचन होता है। वक्तव्य— उक्त दोनों योगों का कल्क नीबू के रस से बनाया जाये तो और भी उत्तम फल देता है।

त्रिवृतादि कल्क त्रिवृत्पलाशबीजानि पारसीकयवानिका। कम्पिल्लकं विडङ्गं च गुडश्च समभागकः॥२६॥ तक्रेण कल्कमेतेषां पिबेत् कृमिगणापहम्। सफेद निसोत पलाश (ढाक) के बीज, खुरासानी अजवायन, कबीला, वायविडंग तथा गुड़ इन सबको समान भाग में लेकर कल्क बनाकर तक्र (मट्ठा या लस्सी) के साथ पीये तो उदर की कृमियों को निकाल देता है। वक्तव्य— एक-दो समय गुड़ मिश्रित खीर खिलाकर तब उक्त योग का प्रयोग करना चाहिये। इस योग का कुछ दिनों तक सेवन करने से कृमियों की उत्पत्ति भी रुक जाती है। सावधान ! एक बार कृमियों को निकाल देने पर भी वे फिर उत्पन्न हो जाते हैं।

तिल कल्क नवनीततिलैः कल्को जेता रक्तार्शिसां स्मृतः॥२७॥ नवनीतसितानागकेशरैश्चापि तद्विधः। तिलों का कल्क नवनीत (मक्खन) मिलाकर खाने से रक्तार्श (खूनी बवासीर) को जीतता है और नागकेसर मिश्री तथा नवनीत का कल्क भी रक्तार्श को जीतता है।


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