शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें118 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे
का निरोध) प्लीहा वृद्धि तथा गुल्म को नष्ट करता है। शूल, कफविकार तथा उदररोगों को हरता है। वक्तव्य-पञ्चकोल में यदि मरिच मिला दी जाये तो उसे 'षडूषण' कहा जाता है। देखें-'पञ्चकोलं स मरिचं षडूषणमुदाहृतम्' (भा० नि०)। त्रिगन्ध-चतुर्जात चूर्ण त्रिगन्धमेलात्वक्पत्रैश्चतुर्जातं सकेशरैः । त्रिगन्धं सचतुर्जातं रूक्षोष्णं लघु पित्तकृत् ।। 15 ।। वर्ण्यं रुचिकरं तीक्ष्णं विषश्लेष्मामयाञ्जयेत् । इलायची, दालचीनी तथा तेजपत्ता-इन तीनों का नाम 'त्रिगन्ध' है और इसी में 'नागकेसर' मिला देने से 'चतुर्जात' कहलाता है। त्रिगन्ध तथा चतुर्जात रूक्ष, उष्ण (गर्म), लघु, पित्तकर, वर्ण के लिए हितकर, रुचिकर तथा तीक्ष्ण है। यह विष तथा कफ के रोगों को जीत लेता है। वक्तव्य-त्रिगन्ध को त्रिजात भी कहा जाता है। इसमें 'एला' के नाम से बड़ी इलायची डाली जाती है, किन्तु कुछ लोग इसमें छोटी इलायची डालने की भी सम्मति देते हैं। कृष्णादि चूर्ण (कृष्णारुणामुस्तक शृङ्गिकाणां तुल्येन चूर्णेन समाक्षिकेण ।। 16 ।। ज्वरातिसारः प्रशमं प्रयाति, सश्वासकासः सवमिः शिशूनाम्।) पीपल, अतीस, नागरमोथा, काकड़ासिंगी-इन चारों द्रव्यों को समान भाग में लेकर चूर्ण बना लें। इसे मधु मिलाकर चटाने से ज्वर, अतिसार, श्वास, कास तथा वमन रोग दूर हो जाते हैं। जीवनीयगण चूर्ण काकोली क्षीरकाकोली जीवकर्षभकौ तथा ।। 17 ।। मेदश्चान्या महामेदा जीवन्ती मधुकं तथा । मुद्गपर्णी माषपर्णी जीवनीया गणस्त्वयम् ।। 18 ।। जीवनीया गणः स्वादुर्गर्भसन्धानकृद्गुरुः । स्तन्यकृद् बृंहणो वृष्यः स्निग्धः शीतस्तृषापहः ।। 19 ।। रक्तपित्तं क्षतं शोषं ज्वरदाहानिलाञ्जयेत् । काकोली, क्षीरकाकोली, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, जीवन्ती, मुलेठी, मुद्गपर्णी (वनमूँग) तथा माषपर्णी (मुगवन या वन उड़द)-इन सबको 'जीवनीयगण' कहा जाता है। यह जीवनीयगण स्वादिष्ट होता है। गर्भसन्धानकारक
(गर्भस्राव तथा गर्भपात को रोकता अथवा गर्भाधान का हेतु) है, गुरु है, दूध को बढ़ाता है, धातुओं को तथा वीर्य को बढ़ाता है, स्निग्ध है, शीत है, तृष्णा को हरता है, रक्तपित्त, क्षय (यक्ष्मा), शोष (धातुओं का सूखना), ज्वर, दाह तथा वातरोगों को जीत लेता है। अष्टवर्ग चूर्ण द्वे मेदे द्वे च काकोल्यौ जीवकर्षभकौ तथा ।। 20 ।। ऋद्धिवृद्धी च तैः सर्वैरष्टवर्ग उदाहृतः । अष्टवर्गों बुधैः प्रोक्तो जीवनीयसमो गुणैः ।। 21 ।। दोनों मेदा (मेदा तथा महामेदा), दोनों काकोली (काकोली तथा क्षीरकाकोली), जीवक, ऋषभक, ऋद्धि तथा वृद्धि इन सबको 'अष्टवर्ग' कहा जाता है। विद्वानों का कथन है, कि अष्टवर्ग के गुण जीवनीयगण के समान ही हैं। वक्तव्य-उक्त अष्टवर्ग कई शताब्दियों से सन्देह में पड़ा है। आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व भावमिश्र ने इनके प्रतिनिधि रूप में निम्न चार द्रव्य निश्चित किये हैं। यथा-'मेदाजीवककाकोलीऋद्धिद्वन्द्वेऽपि चासति । वरीविदार्यश्वगन्धा वाराही च क्रमात् क्षिपेत् ।।' (भा० प्र० नि० ह० वर्ग)। अर्थात् मेदा-महामेदा के अभाव में शतावरी, जीवक-ऋषभक के अभाव में विदारीकन्द, काकोली- क्षीरकाकोली के अभाव में असगन्ध तथा ऋद्धि-वृद्धि के अभाव में वाराहीकन्द लेना चाहिये। इन्हीं का प्रयोग किया भी जाता है। प्रसन्नता की बात है कि इधर वास्तविक (असली) अष्टवर्ग का अन्वेषण भी कुछ परिश्रमी सज्जनों ने किया है, उसका भी यत्र-तत्र प्रयोग होने लगा है। परन्तु प्रामाणिकता का निर्णय फलप्राप्ति पर ही हो सकेगा। लवणपञ्चक चूर्ण सिन्धुसौवर्चलं चैव विडं सामुद्रिकं गडम़् । एकद्वित्रिचतुष्पञ्च लवणानि क्रमाद् विदुः ।। 22 ।। तेषु मुख्यं सैन्धवं स्यादनुक्ते तत्प्रयोजयेत् । सैन्धवाद्यं रोमक़ान्तं ज्ञेयं लवणपञ्चकम् ।। 23 ।। मधुरं सृष्टविण्मूत्रं स्निग्धं सूक्ष्मं बलापहम् । वीर्योष्णं दीपनं तीक्ष्णं कफपित्तविवर्धनम् ।। 24 ।। सिन्धु (सेंधा नमक), सौवर्चल (काला नमक), विड़नमक, सामुद्रिक (समुद्र नमक) तथा गड लवण (साँभर नमक) ये क्रमशः एक लवण (केवल सेंधा नमक), द्विलवण (सेंधा और साँचर्), त्रिलवण (सेंधा, साँचर् तथा विड़),