भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

षष्ठोऽध्यायः] चूर्णकल्पना 121 हरीतक्यादि चूर्ण हरीतकी प्रतिविषा सिन्धु सौवर्चलं वचा। हिङ्गु चेति कृतं चूर्णं पिबेदुष्णेन वारिणा ।। 47 ।। आमातीसारशमनं ग्राहि चाग्निप्रबोधनम् । हरड़, अतीस, सेंधा नमक, सोंचर नमक, वच तथा हींग का बनाया हुआ चूर्ण उष्ण जल के साथ पीयें। यह चूर्ण आमातिसार को शान्त कर जठराग्नि को प्रज्वलित करता है। लघुगङ्गाधर चूर्ण मुस्तमिन्द्रयवं बिल्वं लोध्रं मोचरसं तथा ।। 48 ।। धातकीं चूर्णयेत् तक्रगुडाभ्यां पाययेत् सुधीः । सर्वातीसारशमनं निरुणद्धि प्रवाहिकाम् ।। 49 ।। लघुगङ्गाधरं नाम चूर्णं सङ्ग्राहकं परम्। नागरमोथा, इन्द्रजौ, बेलगिरि, लोध, मोचरस तथा धाय के फूल का चूर्ण बना लें और इसे तक्र (मट्ठा) तथा गुड़ के साथ मिलाकर पिलायें। यह सब अतिसारों को शान्त करता है और प्रवाहिका (पेचिस) को रोकता है। इस चूर्ण का नाम 'लघुगङ्गाधर' है। यह बहुत अच्छा संग्राहक या दस्तों को रोकने वाला है। वृद्धगङ्गाधर चूर्ण मुस्तारलुकशुण्ठीभिर्धातकीलोध्रबालकैः ।। 50 ।। बिल्वमोचरसाभ्यां च पाठेन्द्रयववत्सकैः। आम्रबीजं प्रतिविषा लज्जालुरिति चूर्णितम् ।। 51 ।। क्षौद्रतण्डुलपानीयैः पीतैर्याति प्रवाहिका । सर्वातिसारा ग्रहणी प्रशमं याति वेगता ।। 52 ।। वृद्धगङ्गाधरं चूर्णं सरिद्वेगस्य रोधकम्। नागरमोथा, टेंटू की छाल, सोंठ, धाय के फूल, लोध, नेत्रबाला, बेलगिरी, मोचरस, पाठा, इन्द्रजौ, कुरैया की छाल, आम की गुठली, अतीस तथा लज्जावन्ती-इन सब द्रव्यों का चूर्ण मधु तथा चावलों के धोवन के साथ पीने से प्रवाहिका (पेचिस) दूर हो जाती है, सभी प्रकार के दस्त तथा ग्रहणी रोग शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। इस चूर्ण का नाम 'वृद्धगङ्गाधर' है। यह अपने प्रभाव से नदी के वेग (प्रवाह) को भी रोक देता है। वक्तव्य-यह अतिशयोक्तिपूर्ण फलश्रुति मात्र इसके विशिष्ट प्रभाव के प्रति रोगी तथा चिकित्सक दोनों को अपने गुणों की ओर आकृष्ट करती है। अजमोदादि चूर्ण अजमोदा मोचरसं सशृङ्गबेरं सधातकी कुसुमम् ।। 53 ।। गोदधिमथितयुक्तं गङ्गामपि वाहिनीं रुन्ध्यात्। अजमोदा, मोचरस, सोंठ तथा धाय के फूल का चूर्ण गाय के दही अथवा मट्ठा में मिलाकर पीने से बहती हुई गङ्गा को भी रोक देता है, अतिसार की तो बात ही क्या है? मरिचादि चूर्ण तक्रेण यः पिबेन्नित्यं चूर्णं मरिचसम्भवम् ।। 54 ।। चित्रसौवर्चलोपेतं ग्रहणी तस्य नश्यति । उदरप्लीहमन्दाग्निगुल्मार्शो नाशनं भवेत् ।। 55 ।। जो मनुष्य मरिच, चीता की जड़ तथा सोंचर नमक का चूर्ण मट्ठा के साथ प्रतिदिन पीता है, उसका ग्रहणी रोग नष्ट हो जाता है और उदर रोग, प्लीहा-वृद्धि, मन्दाग्नि, वायुगोला तथा बवासीर का विनाश हो जाता है। कपित्थाष्टक चूर्ण अष्टौ भागाः कपित्थस्य षड्भागा शर्करा मता। दाडिमं तिन्तिडीकं च श्रीफलं धातकी तथा ।। 56 ।। अजमोदा च पिप्पल्यः प्रत्येकं स्युस्त्रिभागिकाः। मरिचं जीरकं धान्यं ग्रन्थिकं बालकं तथा ।। 57 ।। सौवर्चलं यवानी च चातुर्जातं सचित्रकम्। नागरं चैकभागाः स्युः प्रत्येकं सूक्ष्मचूर्णितम् ।। 58 ।। कपित्थाष्टकसंज्ञं स्याच्चूर्णमेतद्गलामयान् । अतीसारं क्षयं गुल्मं ग्रहणीं च व्यपोहति ।। 59 ।। कैथ के फल का सूखा गूदा आठ भाग (8 तोला), चीनी 4 भाग (4 तोला), अनारदाना (खट्टे अनार के बीज), जिरिष्क, बेलगिरी, धाय के फूल, अजमोदा तथा पीपल प्रत्येक तीन-तीन भाग (3-3 तोला), मरिच, जीरा (सफेद भुना हुआ), धनियाँ, पीपलामूल, नेत्रबाला, सोंचरनमक, अजवायन, चतुर्जात (दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता तथा नागकेसर), चीता की जड़ तथा सोंठ प्रत्येक एक-एक भाग (1-1 तोला), इन सबका चूर्ण 'कपित्थाष्टक' कहलाता है। यह चूर्ण गलरोगों, अतिसार, क्षय, गुल्म (वायुगोला) तथा ग्रहणी रोग को नष्ट करता है। दाडिमाष्टक चूर्ण दाडिमी द्विपला ग्राह्या खण्डादष्टपलानि च । त्रिगन्धस्य पलं चैकं त्रिकटु स्यात् पलत्रयम् ।। 60 ।। एतदेकीकृतं सर्वं चूर्णं स्याद् दाडिमाष्टकम्। रुचिकृद्दीपनं कण्ठ्यं ग्राहि कासज्वरापहम् ।। 61 ।।