शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 163, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 127 ग्रहणीरोग, ज्वर, उलटी, शोष, अतिसार, प्लीहा, आनाह, मिलाकर चाटना चाहिये। यह चूर्ण श्वास, कास एवं क्षय मलबन्ध, अरुचि, शूल, मन्दाग्नि, अर्श तथा जीभ एवं गले (यक्ष्मा) को हरता है; हाथ, पाँव एवं शरीर के किसी भी के रोगों को जीतता है। अवयव के दाह को जीतता है; मन्दाग्नि, जीभ की सुप्तता (शून्यता या रसग्रहण की असमर्थता), पसली के शूल, अरुचि, तालीसादि चूर्ण ज्वर एवं ऊपर के स्रोतों (नाक, मुख आदि) द्वारा निकलने तालीसं मरिचं शुण्ठी पिप्पली वंशरोचनम् ।। 132 ।। वाले रक्तपित्त को शीघ्र ही शान्त करता है। एकद्वित्रिचतुःपञ्चकर्षभागान् प्रकल्पयेत्। वक्तव्य-उक्त चूर्ण आयुर्वेद का एक सुप्रसिद्ध योग है। एलात्वचोस्तु कर्षार्धं प्रत्येकं भागमाचरेत् ।। 133 ।। इसने अपने अद्भुत गुणों की धाक प्रत्येक वैद्य के हृदय पर द्वात्रिंशत्कर्षतुलिता प्रदेया शर्करा बुधैः। जमा रखी है। इस चूर्ण को घृत-मधु दोनों के साथ मिलाकर तालीसाद्यमिदं चूर्ण रोचनं पाचनं स्मृतम् ।। 134 ।। खाना चाहिये। इसमें साधारणतया एक तोला घी तथा नौ कासश्वासज्वरहरं छर्द्यतीसारनाशनम्। माशा मधु लेना चाहिये। शोषाध्मानहरं प्लीहाग्रहणीपाण्डुरोगजित् ।। 135 ।। पक्त्वा वा शर्करां चूर्णं क्षिपेत् स्याद् गुटिका ततः। लवणभास्कर चूर्ण तालीसपत्र एक तोला, मरिच दो तोला, सोंठ तीन तोला, सामुद्रलवणं कार्यमष्टकर्षमितं बुधैः। पिप्पली चार तोला एवं वंशलोचन पाँच तोला लें और इलायची पञ्च सौवर्चलं ग्राह्यं बिडं सैन्धवधान्यकात् ।। 140 ।। (छोटी) तथा दालचीनी प्रत्येक आधा-आधा तोला लें और पिप्पली पिप्पलीमूलं कृष्णजीरकपत्रकम्। इसमें बत्तीस तोला चीनी मिला दें। इस चूर्ण का नाम 'तालीसादि नागकेशरतालीसमम्लवेतसकं तथा ।। 141 ।। चूर्ण' है। यह चूर्ण रुचिकर एवं पाचन है। कास, श्वास, ज्वर, द्विकर्षमात्राण्येतानि प्रत्येकं कारयेद् बुधः। छर्दि (कै, वमन, उल्टी) तथा अतिसार को नष्ट करता है, मरिचं जीरकं विश्वमेकैकं कर्षमात्रकम् ।। 142 ।। शोष (यक्ष्मा) तथा अफारा को हरता है और प्लीहारोग, दाडिमं स्याच्चतुष्कर्षं त्वगेला चार्धकार्षिकी। ग्रहणीरोग एवं पाण्डुरोग को जीतता है। अथवा उक्त बत्तीस एतच्चूर्णीकृतं सर्वं लवणं भास्कराभिधम् ।। 143 ।। तोला चीनी की चासनी बनाकर और उसमें चूर्ण मिलाकर शाणप्रमाणं देयं तु मस्तुतक्रसुरासवैः। गोलियाँ बना लें। वातश्लेष्मभवं गुल्मं प्लीहानमुदरं क्षयम् ।। 144 ।। वक्तव्य - चीनी अथवा गुड़ की चासनी में जो चूर्ण डाले अर्शांसि ग्रहणीं कुष्ठं विबन्धं च भगन्दरम्। जायें, उन्हें अत्यन्त बारीक कर लेना चाहिये, अन्यथा गोलियाँ शोफं शूलं श्वासकासावामवातं च हृद्रुजम् ।। 145 ।। उत्तम नहीं बनेंगी। मन्दाग्नि नाशयेदेतद् दीपनं पाचनं परम्। सितोपलादि चूर्ण सर्वलोकहितार्थाय भास्करेणोदितं पुरा ।। 146 ।। सितोपला षोडश स्यादष्टौ स्याद्वंशरोचना ।। 136 ।। सामुद्र नमक आठ तोला, सोंचर नमक पाँच तोला, विरिया पिप्पली स्याच्चतुष्कर्षा स्यादेला च द्विकार्षिकी। नमक, सेंधा नमक, धनियाँ, पीपल, पीपलामूल, कालाजीरा, एकः कर्षस्त्वचः कार्यश्चूर्णयेत् सर्वमेकतः ।। 137 ।। तेजपत्ता, नागकेसर, तालीसपत्र और अम्लवेत ये प्रत्येक द्रव्य सितोपलादिकं चूर्णं मधुसर्पिर्युतं लिहेत्। दो-दो तोला, मरिच, सफेद जीरा (भुना) एवं सोंठ (एक-एक श्वासकासक्षयहरं हस्तपादाङ्गदाहजित् ।। 138 ।। तोला), अनारदाना चार तोला, दालचीनी और इलायची प्रत्येक मन्दाग्निं सुप्तजिह्वत्वं पार्श्वशूलमरोचकम्। आधा तोला, इन सबका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का नाम ज्वरमूर्ध्वगतं रक्तं पित्तमाशु व्यपोहति ।। 139 ।। 'लवणभास्कर' है। इसकी एक मात्रा एक शाण (3 माशा) सितोपला (मिश्री) सोलह तोला, वंशलोचन आठ तोला, है। इसे मस्तु (दही का पानी), तक्र (मट्ठा), सुरा (मद्य) पीपल चार तोला, छोटी इलायची दो तोला एवं दालचीनी एवं आसव (कुमार्यासव आदि किसी आसव) के साथ देना एक तोला, इन सब द्रव्यों का चूर्ण करके एक में मिला लें। चाहिये। यह चूर्ण वात-कफजनित गुल्म, प्लीहा-विकार, इस चूर्ण का नाम 'सितोपलादि' है। इसे घी तथा मधु के साथ उदररोग, क्षय (यक्ष्मा), बवासीर, ग्रहणीरोग, कुष्ठ (कोढ़),