शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें126 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यखण्डे जड़, पीपलामूल, सौंफ, पीपल तथा मरिच-प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1-1 तोला, बड़ी हरड़ का चूर्ण 5 तोला, विधारा का चूर्ण दस तोला लेकर सबको एकत्र कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को उष्ण जल के साथ सेवन करें। यह चूर्ण शोथ (सूजन) को नष्ट करता है, आमवात की पीड़ा को, सन्धियों की पीड़ा को एवं गृध्रसी रोग को नष्ट करता है। कमर, पीठ, गुद एवं जंघाओं (टांगों) की पीड़ा को जीतता है और तूनी (मलाशय एवं मूत्राशय में उत्पन्न होकर गुद तथा लिंग की ओर जाने वाली पीड़ा), प्रतितूनी (तूनी के विपरीत जाने वाली पीड़ा), विश्वाची (बाहु की जकड़न) तथा कफजनित एवं वातजनित रोगों को जीतता है। इस चूर्ण में समान भाग गुड़ डालकर बटक (बड़ी गोलियाँ) भी बनायी जाती हैं। इस योग का नाम 'अजमोदादि बटक' है। वक्तव्य-यह चूर्ण आमवात आदि विकारों की उत्तम औषध है। इसका चूर्ण रूप में तो प्रयोग होता ही है, किन्तु कुछ चिकित्सक गुड़ की चासनी बनाकर उसमें चूर्ण मिलाकर इसकी गोलियाँ भी बना लेते हैं। शुण्ठ्यादि चूर्ण (शुण्ठी सौवर्चलं हिङ्गु दाडिमं चाम्लवेतसम् ।। 120 ।। चूर्णमुष्णाम्बुना पेयं श्वासहद्रोगशान्तये।) सोंठ, सोंचर नमक, घी में भुनी हींग, अनारदाना और अम्लवेतस इनका समान भाग चूर्ण बनाकर उष्ण जल के साथ पीना चाहिये। इससे श्वास एवं हृदयरोग शान्त हो जाते हैं। इस चूर्ण का नाम 'शुण्ठ्यादि चूर्ण' है। वक्तव्य-यह एक उत्तम स्वादिष्ट चूर्ण है। हिंग्वादि चूर्ण हिङ्गु पाठाऽभया धान्यं दाडिमं चित्रकः शठी ।। 121 ।। अजमोदा त्रिकटुकं हपुषा चाम्लवेतसम्। अजगन्धा तिन्तिडीकं जीरकं पौष्करं वचा ।। 122 ।। चव्यं क्षारद्वयं पञ्च लवणानि विचूर्णयेत्। प्राग्भोजनस्य मध्ये वा चूर्णमेतत् प्रयोजयेत् ।। 123 ।। पिबेद् वा जीर्णमद्येन तक्रेणोष्णोदकेन वा। गुल्मे वातकफोद्भूते हृद्ग्रहेऽष्ठीलिकासु च ।। 124 ।। हृद्वस्तिपार्श्वशूलेषु शूले च गुदयोनिजे। मूत्रकृच्छ्रे तथानाहे पाण्डुरोगेऽरुचौ तथा ।। 125 ।। हिक्कायां यकृति प्लीह्नि श्वासे कासे गलग्रहे। ग्रहण्यर्शोविकारेषु चूर्णमेतत् प्रशस्यते ।। 126 ।। भावितं मातुलुङ्गस्य बहुशः स्वरसेन वा। कुर्याच्च गुटिका बह्नीर्वातश्लेष्मामयापहाः ।। 127 ।। घी में भुनी हींग, पाठा, बड़ी हरड़, धनियाँ, अनारदाना, चीता की जड़, कचूर, अजमोदा, सोंठ, मरिच, पीपल, हाऊबेर, अम्लवेत, वनतुलसी के बीज या पत्ते, जिरिष्क, भुना हुआ जीरा, पोहकरमूल, वच, चाव, सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक, सोंचर नमक, विरिया नमक, समुद्र नमक एवं साँभर नमक- इनका चूर्ण बना लें। भोजन के पूर्व अथवा मध्य में (प्रत्येक ग्रास में अथवा भोजन में मिलाकर) इस चूर्ण का प्रयोग करें अथवा पुराना मद्य (आसव आदि) के साथ अथवा मट्ठा के साथ अथवा उष्ण जल के साथ प्रयोग करें। वात एवं कफ से उत्पन्न हुये गुल्म, हृदय की जकड़न, अष्ठीला (वातव्याधि- विशेष), हृदय, वस्ति (मूत्राशय) एवं पसली के शूल, गुद तथा योनि (गर्भाशय) के शूल, मूत्रकृच्छ्र, आनाह (अन्त्रगति- निरोध), पाण्डुरोग, अरुचि, हिचकी, यकृत् एवं प्लीहा के विकारों, श्वास, कास, गले की रुकावट, ग्रहणी एवं अर्श के विकारों में यह चूर्ण उत्तम माना जाता है। अथवा बिजौरा नींबू के स्वरस से कई बार भावना देकर इस चूर्ण की गोलियाँ बना लें। ये गोलियाँ वातज एवं कफज रोगों को नष्ट करती हैं। वक्तव्य-यह सुप्रसिद्ध 'हिंग्वादि चूर्ण' है। बिजौरा नींबू के स्थान में 'कागजी नींबू' का भी प्रयोग किया जा सकता है। यवानीखाण्डव चूर्ण यवानी दाडिमं शुण्ठी तिन्तिडीकाम्लवेतसौ। बदराम्लं च कुर्वीत चतुःशाणमितानि च ।। 128 ।। सार्धद्विशाणं मरिचं पिप्पली दशशाणिका। त्वक्सौवर्चलधान्याकं जीरकं द्विदिशाणकम् ।। 129 ।। चतुःषष्टिमितैः शाणैः शर्करामत्र योजयेत्। चूर्णितं सर्वमेकत्र यवानीखाण्डवाभिधम् ।। 130 ।। चूर्ण नयेत् पाण्डुरोगं हृद्रोगं ग्रहणीं ज्वरम्। छर्दिशोषारुतिसारांश्च प्लीहानाहविबन्धताम् ।। 131 ।। अरुचिं शूलमन्दाग्निमर्शोजिह्वागलामयान्। अजवायन, अनारदाना, सोंठ, तिन्तिडीक (जिरिष्क), अम्लवेत तथा बेर का चूरा 4-4 शाण, मरिच 2½ शाण, पिप्पली 10 शाण, दालचीनी, कालानमक, धनियाँ तथा जीरा 2-2 शाण एवं शर्करा 64 शाण, सबको पीसकर चूर्ण बना लें। इसका नाम 'यवानीखाण्डव' है। यह पाण्डुरोग, हृदयरोग,