शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 125 एवं सज्जीखार), सौंफ, सोया, वच, अजमोदा, वनतुलसी के बीज या पत्ते, हाऊबेर, सफेद जीरा, काला जीरा, मरिच, पीपलामूल, पीपल, गजपीपल, हींग (घी में भुनी हुई), हिंगुपत्री (डिकेमाली), कचूर, पाठा, कलौंजी, सोंठ, चीता की जड़, चव्य, वायविडंग, अम्लवेत, अनारदाना, जिरिष्क, निसोत, दन्ती की जड़, शतावर, इन्द्रायण की जड़ अथवा फल, भारंगी, देवदारु, अजवायन, धनियाँ, तुम्बुल, पोहकरमूल, खट्टे बेर एवं बडी हरड़, इन सब द्रव्यों का चूर्ण समान भाग में लेकर एक में मिला दें, फिर इसे अदरख के रस तथा नीबू के रस की भावना दें, अर्थात् उक्त रसों में भली-भाँति सानकर सुखा लें। इस चूर्ण को अधिक मात्रा में लेकर, पुरानी मद्य (आसव-अरिष्ट), उष्ण जल, बेर का क्वाथ, मट्ठा, ऊँटनी का दूध अथवा दही का पानी, इनमें से किसी एक अनुपान के साथ पीयें। यह चूर्ण यकृत्-विकार, कटिशूल (कमर का दर्द), गुदरोग (तूनी-प्रतितूनी आदि अथवा मलाशय के रोग), कुक्षिरोग (आमाशय के रोग) एवं हृदय के रोग, बवासीर, विष्टम्भ (अन्त्र आदि की रुकावट), मन्दाग्नि, गुल्म, प्लीहा-वृद्धि, उदर रोग, हिचकी, अफारा, श्वास एवं कास को जीतता है; इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। अथवा विद्वान् (स्नेहपाक को भली-भाँति जानने वाला) चिकित्सक इन्हीं औषधियों का कल्क एवं क्वाथ डालकर घृत भी तैयार कर सकता है। वक्तव्य-घृतपाक की विधि इसी खण्ड के 9वें अध्याय में देखें। तुम्बुर्वादि चूर्ण तुम्बूरूणि त्रिलवणं यवानी पुष्कराह्वयम् ।। 107 ।। यवक्षाराभयाहिङ्गुविडङ्गानि समानि च। त्रिवृत् त्रिभागा विज्ञेया सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ।। 108 ।। पिबेदुष्णेन तोयेन यवक्वाथेन वा पिबेत् । जयेत्सर्वाणि शूलानि गुल्माध्मानोदराणि च ।। 109 ।। तुम्बुरु (तुम्बुल), सेंधा नमक, सोंचर नमक, विरिया नमक, देशी अजवायन, पोहकरमूल, जौखार, बड़ी हरड़, हींग (घृत भृष्ट) एवं वायविडंग, इन सब द्रव्यों को समान भाग (एक-एक तोला) में लें और निसोत (सफेद) तीन भाग (3 तोला) लेकर सबका सूक्ष्म चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गरम जल के साथ अथवा इन्द्रजौ के क्वाथ के साथ पीयें। यह चूर्ण सभी प्रकार के शूल को, गुल्म को, आध्मान (अफारा) एवं उदर रोग को जीतता है। चित्रकादि चूर्ण चित्रकं नागरं हिङ्गु पिप्पली पिप्पलीजटा। चव्याजमोदा मरिचं प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ।। 110 ।। स्वर्जिका च यवक्षारः सिन्धुः सौवर्चलं विडम्। सामुद्रं रोमकं च कोलमात्राणि कारयेत् ।। 111 ।। एकीकृत्याखिलं चूर्णं भावयेन्मातुलुङ्गजैः । रसैर्दाडिमजैर्वापि शोषयेदातपेन च ।। 112 ।। एतच्चूर्णं जयेद् गुल्मं ग्रहणीमामजां रुजम्। अग्निं च कुरुते दीप्तं रुचिकृत् कफनाशनम् ।। 113 ।। चीता की जड़, सोंठ, भुनी हींग, पीपल, पीपलामूल, चव्य (चाव), अजमोदा तथा मरिच प्रत्येक एक-एक कर्ष (1-1 तोला), सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक, सोंचर नमक, विरिया नमक, सामुद्र नमक तथा साँभर नमक प्रत्येक एक-एक कोल (आधा-आधा तोला), इन सबका चूर्ण करें। यह चूर्ण गुल्म, ग्रहणीरोग एवं आमजनित पीड़ा को जीतता है और अग्नि को दीप्त करता है। यह रुचिकारक है एवं कफ को नष्ट करता है। वडवानल चूर्ण सैन्धवं पिप्पलीमूलं पिप्पली चव्यचित्रकम्। शुण्ठी हरीतकी चेति क्रमवृद्धानि चूर्णयेत् ।। 114 ।। वडवानलनामैतच्चूर्णं स्यादग्निदीपनम्। सेंधा नमक, पीपलामूल, पीपल, चव्य, चीता, सोंठ तथा हरड़ को क्रमशः 1-2-3-4-5-6-7 भाग में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का नाम 'वडवानल' है और यह जठराग्नि को दीप्त करता है। अजमोदादि चूर्ण अजमोदा विडङ्गानि सैन्धवं देवदारु च ।। 115 ।। चित्रकः पिप्पलीमूलं शतपुष्पा च पिप्पली। मरिचं चेति कर्षांशं प्रत्येकं कारयेद् बुधः ।। 116 ।। कर्षंस्तु पञ्च पथ्याया दश स्युर्वृद्धदारुकात्। नागराच्च दशैव स्युः सर्वाण्येकत्र चूर्णयेत् ।। 117 ।। पिबेत् कोष्णजलेनैव चूर्णं श्वयथुनाशनम् । आमवातरुजं हन्ति सन्धिपीडां च गृध्रसीम् ।। 118 ।। कटिपृष्ठगुदस्थां च जङ्घयोश्च रुजं जयेत्। तूनीप्रतूनीविश्वाचीकफवातामयाञ्जयेत् ।। 119 ।। समेन वा गुडेनास्य वटकान् कारयेद्भिषक्। अजमोदा, वायविडंग, सेंधा नमक, देवदारु, चीता की