भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 356 में से

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124 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे अनार के रस अथवा अनार के छिलके के क्वाथ के साथ देना चाहिये तथा स्थावर एवं जंगम विष में घी के साथ मिलाकर प्रयुक्त करे। इसका नाम 'नारायण चूर्ण' है। यह दुष्ट रोगों के समूह को नष्ट करता है। वक्तव्य-शोधन अर्थात् वमन एवं विरेचन के पूर्व सभी शोधनीय मनुष्यों को विशेष रूप से क्रूर कोष्ठ (कड़े कोठे) वालों में पाचनक्रिया, स्नेहनक्रिया तथा स्वेदनक्रिया (देखें- शा० उ० खं० 1-2) का प्रयोग किया जाता है, ताकि आमदोष पककर अपना स्थान छोड़ दें, कोष्ठ चिकना हो जाये और शरीर भर के या सम्पूर्ण धातुओं के दोष कोष्ठ में आ जायें। इन क्रियाओं से लाभ यह होता है कि दोषों या दूषित पदार्थों या दूषक पदार्थों के निकलने में कठिनाई नहीं होती अर्थात् वमन तथा विरेचन सुखपूर्वक हो जाते हैं। उक्त चूर्ण एक उत्तम विरेचन चूर्ण है। अतएव उक्त क्रियाएँ कराकर ही इसका सेवन कराना चाहिये। हपुषादि चूर्ण हपुषा त्रिफला चैव त्रायमाणा च पिप्पली। हेमक्षीरी त्रिवृच्चैव शातला कटुका वचा।।92।। नीलिनी सैन्धवं कृष्णां लवणं चेति चूर्णयेत्। उष्णोदकेन मूत्रेण दाडिमत्रिफलारसैः ।। 93 ।। तथा मांभरसेनापि यथायोग्यं पिबेन्नरः । अजीर्णे प्लीह्नि गुल्मेषु शोफार्शोविषमाग्निषु ।। 94 ।। हलीमकामलापाण्डुकुष्ठाध्मानोदरेष्वपि । हाऊबेर, त्रिफला, त्रायमाणा, पिप्पली, चोक (सत्यानाशी की जड़), सफेद निसोत, सतवन, कुटकी, वच, नीम की पत्ती अथवा जड़, सेंधा नमक अथवा काला नमक-इनका चूर्ण बना लें। इसका नाम 'हपुषादि चूर्ण' है। इसको आवश्यकतानुसार उष्ण जल के साथ अथवा गोमूत्र के साथ, अनार के रस के साथ, त्रिफला के रस के साथ अथवा मांसरस के साथ अजीर्ण (अपच या बदहजमी) प्लीहा रोग, गुल्म, सूजन, बवासीर, विषमाग्नि, हलीमक (कालाजार), कामला (पीलिया), पाण्डुरोग, कुष्ठ, अफारा एवं उदर रोगों में पीना चाहिये। पञ्चसम चूर्ण शुण्ठी हरीतकी कृष्णा त्रिवृत्सौवर्चलं तथा ।। 95 ।। समभागानि सर्वाणि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत्। ज्ञेयं पञ्चसमं चूर्णमेतच्छूलहरं परम् ।। 96 ।। आध्मानजठरार्शोज्मामवातहरं स्मृतम्। सोंठ, बड़ी हरड़, पीपल, सफेद निसोत एवं सोंचर नमक- इन सब द्रव्यों को समान भाग में लेकर सूक्ष्म चूर्ण बना लें। इसका नाम 'पञ्चसम चूर्ण' है। यह चूर्ण शूल अफारा, उदर रोग एवं बवासीर को नष्ट करता है और आमवात (गठिया) को हरता है। नाराच चूर्ण कर्षमात्रा भवेत्कृष्णा त्रिवृता स्यात्पलोन्मिता ।। 97 ।। खण्डात्पलं च विज्ञेयं चूर्णमेकत्र कारयेत्। कर्षोन्मितं लिहेदेतत् क्षौद्रेणाध्माननाशनम् ।। 98 ।। गाढविट्कोदरकफान् पित्तशूलं च नाशयेत्। पीपल एक कर्ष (तोला), निसोत एक पल (4 तोला) तथा खाँड एक पल (4 तोला), पहले दो वस्तुओं को पीसकर, चीनी मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को एक कर्ष परिमाण में लेकर मधु के साथ मिलाकर चाट लें। इससे अफारा का नाश होता है, गाढ़ विट्कता (कब्जियत), उदर रोग, कफ के विकार एवं पित्तजनित शूल का नाश होता है। इस चूर्ण का नाम 'नाराच चूर्ण' है। इस चूर्ण के सेवन से विरेचन होता है। लवणत्रितयादि चूर्ण लवणत्रितयं क्षारौ शतपुष्याद्वयं वचा।।99।। अजमोदाऽजगन्धा च हपुषा जीरकद्वयम्। मरिचं पिप्पलीमूलं पिप्पली गजपिप्पली।। 100 ।। हिङ्गुश्च हिङ्गुपत्री च शठी पाठोपकुञ्चिका। शुण्ठी चित्रकचव्यानि विडङ्गं चाम्लवेतसम्।। 101 ।। दाडिमं तिन्तिडीकं च त्रिवृद्दन्ती शतावरी। इन्द्रवारुणिका भार्गी देवदारु यवानिका ।। 102 ।। कुस्तुम्बुरुस्तुम्बुरूणि पौष्करं बदराणि च। शिवा चेति समांशानां चूर्णमेकत्र कारयेत् ।। 103 ।। भावयेदार्द्रकरसैर्बीजपूररसैस्तथा । तत्पिबेत् सर्पिषा जीर्णे मद्येनोष्णोदकेन वा ।। 104 ।। कोलाम्भसा वा तक्रेण दुग्धेनौष्ट्रेण मस्तुना। यकृत्प्लीहकटीशूलगुदकुक्षिरुदामयान् ।। 105 ।। अर्शोविष्ठम्भमन्दाग्निगुल्मप्लीहोदराणि च। हिक्काध्मानश्वासकासाञ्जयदेतान्न संशयः ।। 106 ।। एतैरेवौषधैः सम्यग् घृतं वा साधयेद्भिषक्। लवणत्रय (सेंधा, सोंचर एवं विड), दोनों क्षार (जौखार

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