शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ
पृष्ठ 164, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 164
128 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे विबन्ध (मलबन्ध), भगन्दर, सूजन, शूल, श्वास, कास, आमवात, हृदयशूल एवं मन्दाग्नि को नष्ट करता है। यह अत्यन्त दीपन तथा पाचन है। प्राचीनकाल में श्रीभास्कराचार्य ने सभी लोगों की भलाई के लिए इस चूर्ण का निर्माण किया था।
<center>**एलादि चूर्ण**</center> **एलाप्रियङ्गुमुस्तानि कोलमज्जा च पिप्पली।** **श्रीचन्दनं तथा लाजा लवङ्गं नागकेशरम्।।147।।** **एतच्चूर्णीकृतं सर्वं सिताक्षौद्रयुतं लिहेत्।** **वातपित्तकफोद्भूतां छर्दिं हन्त्यतिवेगतः ।।148।।** छोटी इलायची, प्रियंगु (फूलप्रियंगु), नागरमोथा, बेर की मींगी (गिरी), पीपल, लालचन्दन, लावा (खील), लौंग एवं नागकेसर, इन सबका चूर्ण बनाकर चीनी तथा शहद के साथ मिलाकर चाटना चाहिये। यह चूर्ण वात, पित्त एवं कफ से उत्पन्न छर्दि (कै या उल्टी) को शीघ्र ही रोकता है। <center>**व्याघ्री चूर्ण**</center> **(व्याघ्रीजीरकधात्रीणां चूर्ण मधुयुतं लिहेत्।** **ऊर्ध्ववातमहाश्वासतमकैर्मुच्यते क्षणात्।।149।।)** कण्टकारी की जड़, सफेद जीरा एवं आँवला का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर चाटना चाहिये। इसके सेवन से रोगी ऊर्ध्ववात (उद्गार या डकार), महाश्वास एवं तमकश्वास से शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। <center>**पञ्चनिम्ब चूर्ण**</center> **मूलं पत्रं फलं पुष्पं त्वचं निम्बात् समाहरेत्।** **सूक्ष्मचूर्णीमदं कुर्यात् पलैः पञ्चदशोन्मितैः।। 150 ।।** **लोहभस्महरीतक्यौ चक्रमर्दकचित्रकौ।** **भल्लातकं विडङ्गानि शर्करामलकं निशा।। 151 ।।** **पिप्पली मरिचं शुण्ठी बाकुची कृतमालकः।** **गोक्षुरश्च पलोन्मानमेकैकं कारयेद् बुधः ।। 152 ।।** **सर्वमेकीकृतं चूर्णं भृङ्गराजेन भावयेत्।** **अष्टभागावशिष्टेन खदिरासनवारिणा ।। 153 ।।** **भावयित्वा च संशुष्कं कर्षमात्रं ततः पिबेत्।** **खदिरासनतोयेन सर्पिषा पयसाऽथवा ।। 154 ।।** **मासेन सर्वकुष्ठानि विनिहन्ति रसायनम्।** **पञ्चनिम्बमिदं चूर्णं सर्वरोगप्रणाशनम् ।। 155 ।।** नीम के जड़ की छाल, पत्ते, फल (फल की मींगी), फूल एवं तने की छाल, इन सबका अत्यन्त सूक्ष्म (बारीक) --- चूर्ण पन्द्रह पल (छः तोला) लोहभस्म, बड़ी हरड़, चकवड़ (बनाड़ या पनवाड़) के बीज, चीता की जड़, शुद्ध भिलावा, वायविडंग, चीनी, आँवला, हल्दी, पीपल, मरिच, सोंठ, बावची, अमलतास की गुद्दी तथा गोखरू, इनका चूर्ण चार-चार तोला बनवा लें और सबको एक में मिलाकर भाँगरा के स्वरस से भावना दें, फिर खैरसार तथा विजयसार के आठवाँ अंश शेष रहे हुये क्वाथ से भावना देकर भली-भाँति सुखा लें, तत्पश्चात् एक तोला चूर्ण को खैरसार और विजयसार के क्वाथ के साथ अथवा घी के साथ अथवा जल के साथ सेवन करे। एक मास तक सेवन करने से यह सभी प्रकार के कुष्ठों को नष्ट करता है। यह रसायन (जराव्याधिनाशक) है तथा सब रोगों को नष्ट करता है। इसका नाम 'पञ्चनिम्ब चूर्ण' है। **वक्तव्य**—भिलावा तथा अमलतास की गुद्दी को पृथक् ही भाँगरा के रस में भली-भाँति पीस लेना चाहिये, क्योंकि ये द्रव्य कपड़छन नहीं किये जा सकते। <center>**शतावर्यादि चूर्ण**</center> **शतावरी गोक्षुरश्च बीजं च कपिकच्छुजम्।** **गाङ्गेरुकी चातिबला बीजमिक्षुरकोद्भवम् ।। 156 ।।** **चूर्णितं सर्वमेकत्र गोदुग्धेन पिबेन्निशि।** **न तृप्तिं याति नारीभिर्नरश्चूर्णप्रभावतः ।। 157 ।।** शतावर, गोखरू, किवाँच के बीज, गंगेरन (गुलसकरी) के बीज, बरियारा के बीज एवं तालमखाना के बीज, इन सबका समान भाग में चूर्ण बनाकर एक में मिला दें और इसे एक तोला लेकर रात्रि में गोदुग्ध के साथ सेवन करे। इस चूर्ण के प्रभाव से मनुष्य स्त्रियों के सहवास से तृप्ति को प्राप्त नहीं होता। <center>**अश्वगन्धादि चूर्ण**</center> **अश्वगन्धा दशपला तन्मात्रो वृद्धदारुकः।** **चूर्णीकृत्योभयं विद्वान् घृतभाण्डे निधापयेत् ।। 158 ।।** **कर्षैकं पयसा पीत्वा नारीभिर्नैव तृप्यति।** **अगत्वा प्रमदां भूयाद् वलीपलितवर्जितः ।। 159 ।।** नागौरी असगन्ध चालीस तोला, विधारा चालीस तोला, इन दोनों का चूर्ण बनाकर विद्वान् मनुष्य घी के पात्र में रख दें। इसमें से एक तोला की एक मात्रा लेकर गाय के दूध के साथ पीकर स्त्रियों से (मैथुन में) तृप्त नहीं होता। यदि स्त्री संसर्ग न करे, अर्थात् ब्रह्मचारी बना रहे तो वली (झुर्रियाँ) एवं पलित (जवानी में बालों का सफेद होना रोग) से मुक्त हो जाता है।