भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 356 में से

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पृष्ठ 168

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132 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ मध्यमखण्डे [बायाँ स्तम्भ] सविषाण्वयात्' (सु० सू० अ० 45.134) इस वाक्य द्वारा केवल 'पौत्तिक' मधु को ही विष का सम्बन्ध होने के कारण रूक्ष अथवा उष्ण कहा गया है। दूसरे प्रकार के सब मधु शीतल माने गये हैं। देखें-चरक तथा सुश्रुत के उक्त अध्यायों को। पर्वतीय प्रदेशों में मधु को अग्नि में तपाकर साफ करते हैं और रख देते हैं और उसकी मिठाइयाँ भी बनाते हैं। सञ्जीवनी बटी विडङ्गं नागरं कृष्णा पथ्यामलकबिभीतकम् ॥ 18 ॥ वचा गुडूची भल्लातं सविषं चात्र योजयेत्। एतानि समभागानि गोमूत्रेणैव पेषयेत् ॥ 19 ॥ गुञ्जाभा गुटिका कार्या दद्यादार्द्रकजै रसैः। एका मजीर्णगुल्मेषु द्वे विषूच्यां प्रदापयेत् ॥ 20 ॥ तिस्रश्च सर्पदष्टे तु चतस्रः सन्निपातके। वटी सञ्जीवनी नाम्ना सञ्जीवयति मानवम् ॥ 21 ॥ वायविडंग, सोंठ, पीपल, बड़ी हरड़, आँवला बहेड़ा, वच, गिलोय, शुद्ध भिलावा तथा शुद्ध विष (मीठा तेलिया) इन सबका चूर्ण समान भाग में लेकर गोमूत्र के साथ भली-भाँति पीसना चाहिये और रत्ती भर की गोलियाँ बनानी चाहिये। इनका प्रयोग अदरख के रस के साथ करना चाहिये। अजीर्ण (बदहजमी) तथा गुल्म में एक गोली, विसूची (हैजा या कालरा) में दो गोलियाँ, सर्पदष्ट (साँप के काटे हुये) मनुष्य को तीन गोलियाँ और सन्निपात में चार गोलियाँ एक मात्रा में देनी चाहिये। इस गोली का नाम 'सञ्जीवनी' है और यह मरते हुये प्राणी को भी जीवित कर देती है। वक्तव्य- उक्त वटी सचमुच 'यथा नाम तथा गुणः' कहावत को चरितार्थ करती है। जब रोगी मुमूर्षु हो जाता है अर्थात् शरीर ठण्डा एवं नाड़ी छूटने लगती है, बोली बन्द हो जाती है, आँखें चढ़ जाती हैं, तब भी यह अपने अद्भुत गुणों का परिचय देती है। रोगी मृत्यु के मुख से छुटकारा पा जाता है। उक्त रोगों के अतिरिक्त ज्वर, प्लेग एवं शिरोरोग आदि रोगों में भी यह अपना आश्चर्यजनक प्रभाव दिखलाती है। व्योषादि बटी व्योषाम्लवेतसं चव्यं तालीसं चित्रकं तथा। जीरकं तिन्तिडीकं च प्रत्येकं कर्षभागिकम् ॥ 22 ॥ त्रिसुगन्धं त्रिशाणं स्याद् गुडः स्यात्कर्षविंशतिः। व्योषादिगुटिका सामपीनसश्वासकासजित् ॥ 23 ॥ रुचिश्वरकरी ख्याता प्रतिश्यायप्रणाशिनी। [दायाँ स्तम्भ] सोंठ, मरिच, पीपल, अम्लवेत, चव्य, तालीसपत्र, चीता की जड़, सफेद जीरा तथा जिरिष्क प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण 1-1 तोला, दालचीनी, बड़ी इलायची तथा तेजपत्ता प्रत्येक पौन-पौन तोला और गुड़ बीस तोला लें। गुड़ की चासनी बनाकर उक्त द्रव्यों का चूर्ण मिलाकर गोलियाँ बना लेनी चाहिये। यह 'व्योषादिगुटिका' आमदोष युक्त पीनस (जुकाम), श्वास तथा कास को जीतती है, रुचि को बढ़ाती है तथा स्वर (आवाज) को खोलती है और प्रतिश्याय को नष्ट करने में प्रसिद्ध है। गुड़ के चार योग आमेषु सगुडां शुण्ठीमजीर्णे गुडपिप्पलीम् ॥ 24 ॥ कृच्छ्रे जीरगुडं दद्यादर्शःसु सगुडाभयाम्। आम के विकारों में गुड़ तथा सोंठ की गोली, अजीर्ण में गुड़ और पीपल का गोली, मूत्रकृच्छ्र में सफेद जीरा तथा गुड़ की गोली और बवासीर में गुड़ और हरड़ का गोली प्रयुक्त करनी चाहिये। वक्तव्य- उक्त श्लोक में चार योगों का निर्देश किया गया है। सभी में गुड़ दुगुना लेना चाहिये। वृद्धदारुक मोदक वृद्धदारुकभल्लातशुण्ठीचूर्णेन योजितः ॥ 25 ॥ मोदकः सगुडो हन्यात् षड्विधार्शःकृतां रुजम्। विधारा, शुद्ध भिलावा तथा सोंठ का चूर्ण बनाकर गुड़ (दुगुना) में गोली बनाना चाहिये। यह छः प्रकार के बवासीर के कष्टों को नष्ट करती है। सूरण-पिण्डी शुष्कसूरणचूर्णस्य भागान् द्वात्रिंशदाहरेत् ॥ 26 ॥ भागान् षोडश चित्रस्य शुण्ठ्या भागचतुष्टयम्। द्वौ भागौ मरिचस्यापि सर्वाण्येकत्र चूर्णयेत् ॥ 27 ॥ गुडेन पिण्डिकां कुर्यादशंसां नाशनीं पराम्। सूखे सूरण (जिमीकन्द) का चूर्ण बत्तीस तोला, चीता का चूर्ण सोलह तोला, सोंठ का चूर्ण चार तोला और मरिच का चूर्ण दो तोला, लेकर दूने गुड़ के साथ गोलियाँ बनायें। यह बवासीर को नष्ट करने में परमोत्तम है। इस योग का नाम 'सूरण-पिण्डी' है। सूरण-बटक सूरणे वृद्धदारुश्च भागैः षोडशभिः पृथक् ॥ 28 ॥

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