भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

138 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे काँचनार की छाल दस पल (40 तोला), त्रिफला अर्धमात्रेण सर्वेभ्यस्ततः खण्डं समं क्षिपेत्। (बीजरहित) छः पल (24 तोला), त्रिकटु तीन पल (12 जलं च द्विगुणं दत्त्वा पाचयेत शनैः शनैः।। 103 ।। तोला), बरना की छाल एक पल (4 तोला), बड़ी इलायची, ततः पक्वं समुद्धृत्य वृत्तान् कुर्वीत मोदकान्। दालचीनी तथा तेजपत्ता एक-एक कर्ष-इन सबका एक साथ भुक्त्वा सायं पलैकं च पिबेत् क्षीरं चतुर्गुणम्।। 104 ।। चूर्ण बना लें और जितना यह चूर्ण हो उतना ही शुद्ध गूगल वर्जनीयौ विशेषेण क्षाराम्लौ द्वौ रसावपि। लें, तत्पश्चात् गूगल को जल में घोलकर उक्त चूर्ण मिला दें। कृत्वैवं रमयेन्नारीर्बह्वीर्न क्षीयते नरः।। 105 ।। फिर भली प्रकार कूटकर (थोड़ा-थोड़ा घी देकर) तथा एक इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां पिण्ड-सा बनाकर रख दें अथवा एक-एक शाण की गोलियाँ शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे वटककल्पना नाम बनाकर तथा सुखाकर रख दें। यह 'काञ्चनारगुग्गुलु' भयानक सप्तमोऽध्यायः ।। 7 ।। अपची को, अर्बुद (रसोली) को, ग्रन्थियों (लसीका-ग्रन्थियों छिलके रहित जौ एवं चावलों का चूर्ण (आटा) तथा के विकारों) को, व्रणों को, गुल्मों को, कुष्ठों तथा भगन्दर को पीपल का चूर्ण एक-एक पल ले लें और सब चूर्णों को 2½ जीतता है। इसके अनुपान के लिए गोरखमुण्डी का क्वाथ, पल गोघृत में भून लें (जैसा कि हलुआ बनाने के लिए भुना खैरसार का क्वाथ अथवा उष्ण जल देना चाहिये। जाता है) फिर सबके समान चीनी (साढ़े सात पल) डाले गूगल-शोधन-विधि-उत्तम कोटि का भैंसिया गूगल और दुगुना (15 पल) जल डालकर धीरे-धीरे पकाये। जब आवश्यकतानुसार लेकर जिस रोग को नष्ट करने के लिए भली-भाँति पक जाये तो कुछ ठंडा होने पर गोल-गोल लड्डू तैयार करना हो उस रोग को नष्ट करने वाली औषधियों के बनाकर रख दें। इनमें से एक लड्डू सायंकाल खाकर साथ में क्वाथ में अथवा गोमूत्र में पकाकर घुल जाने पर (यदि थोड़ा चौगुना दूध पीयें। इसका सेवन करते समय क्षार (लवण) नहीं भी घुलता तो उसे घोलने की चेष्टा नहीं करनी चाहिये) और खटाई को अवश्य त्याग दें। इनका सेवन करने पर छानकर गुड़पाक के समान गाढ़ा होने पर चूल्हे से उतार और मनुष्य बहुत-सी स्त्रियों से रमण कर सकता है और क्षीण धूप में पूर्ण रूप से सुखाकर रख लेना चाहिये। यह गूगल (दुर्बल या कृश) नहीं होता। शुद्ध हो गया। गूगल के योगों का निर्माण करने में वक्तव्य-इस योग को यदि उक्त रीति से बनायें तो आवश्यकतानुसार घी डाला जाता है और उसे अधिक से केवल एक दिन के लिए बनायें, अन्यथा बिगड़ जायगा और अधिक कूटा जाता है। इसमें 'सवा लाख' तक चोटें लगायी यदि चीनी की चासनी में बनाया जाता है तो एक-दो सप्ताह जाती हैं। जहाँ तक हो सके पीला चमकदार गूगल ही लेना टिक सकता है। यदि जल का योग किया ही न जाये तो बहुत चाहिये, क्योंकि यही उत्तम होता है। दिनों तक भी नहीं बिगड़ता। इसमें घी आधा नहीं बल्कि माषादि मोदक समान भाग में लेना चाहिये। निस्तुषं माषचूर्णं स्यात् तथा गोधूमसम्भवम्। 'उदर्दनाशकमोदक' यहाँ हमने प्रस्तुत योग का संग्रह निस्तुषं यवचूर्णं च शालितण्डुलजं तथा।। 101 ।। किया है। इसकी निर्माण-विधि इस प्रकार है-गुड़ दो भाग, सूक्ष्मं च पिप्पलीचूर्णं पलिकान्युपकल्पयेत्। अजवायन चूर्ण एक भाग, दोनों की गोलियाँ बनाकर खायें एतदेकीकृतं सर्वं भर्जयेद् गोघृतेन च।। 102 ।। और पथ्य भोजन करें तो सात दिनों में सर्वशरीरव्यापी 'उदर्द' नष्ट हो जाता है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का सातवाँ अध्याय समाप्त ।। 7 ।।