भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

सप्तमोऽध्यायः]
वटककल्पना
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[वाम-स्तम्भ]

त्रिफला गुग्गुलु त्रिपलं त्रिफलाचूर्णं कृष्णाचूर्णं पलोन्मितम्। गुग्गुलुः पाञ्चपलिकः क्षोदयेत् सर्वमेकतः॥82॥ ततस्तु गुटिकां कृत्वा प्रयुञ्ज्याद् वह्न्यपेक्षया। भगन्दरं गुल्मशोथावर्शांसि च विनाशयेत्॥83॥ त्रिफला का चूर्ण तीन पल (12 तोला), पीपल का चूर्ण एक पल (4 तोला) और शुद्ध गूगल बीस तोला, इन सबको मिलाकर घी के योग से भली-भाँति कूटना चाहिये। तत्पश्चात् गोलियाँ बना तथा सुखाकर रख दें। पाचन-शक्ति का विचार करके इन गोलियों का प्रयोग रोगी को कराना चाहिये। यह योग भगन्दर, गुल्म, शोथ तथा अर्श को नष्ट करता है।

गोक्षुरादि गुग्गुलु अष्टाविंशतिसङ्ख्यानि पलान्यानीय गोक्षुरात्। विपचेत् षड्गुणे नीरे क्वाथोऽर्धशेषितः॥84॥ ततः पुनः पचेत् तत्र पुरं सप्तपलं क्षिपेत्। गुडपाकसमाकारं ज्ञात्वा तत्र विनिक्षिपेत्॥85॥ त्रिकटु त्रिफला मुस्तं चूर्णितं पलसप्तकम्। ततः पिण्डीकृतस्यास्य गुटिकामुपयोजयेत्॥86॥ हन्यात् प्रमेहं कृच्छ्रं च प्रदरं मूत्रघातकम्। वातास्रं वातरोगांश्च शुक्रदोषं तथाश्मरीम्॥87॥ अट्ठाईस पल गोखरू को कूटकर छह गुने जल में पकायें, आधा जल शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले लें। फिर इस क्वाथ में सात पल (28 तोला) शुद्ध गूगल डालकर पकायें, जब गुड़पाक के समान हो जाये तो निम्नलिखित द्रव्यों का सात पल कपड़छान चूर्ण डाल दें। ये द्रव्य हैं-सोंठ, मरिच, पीपल तीन पल (12 तोला), हरड़, बहेड़ा, आँवला तीन पल और नागरमोथा एक पल। फिर घी के योग से भली-भाँति कूटकर तथा गोलियाँ बनाकर प्रयोग करें। यह योग प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र (कष्ट के साथ मूत्र का आना), प्रदर, मूत्राघात (मूत्रबन्ध), वातरक्त, वातरोग, शुक्र-विकार तथा अश्मरी (पथरी) को नष्ट करता है।

त्रिफला मोदक त्रिफलाष्टपला कार्या भल्लातं च चतुष्पलम्। बाकुची पञ्चपलिका विडङ्गानां चतुष्पलम्॥88॥ हतलोहं त्रिवृच्चैव गुग्गुलुश्च शिलाजतु। एकैकं पलमात्रं स्यात् पलार्द्धं पौष्करं भवेत्॥89॥ चित्रकस्य पलार्द्धं स्याद् द्विशाणं मरिचं भवेत्। नागरं पिप्पली मुस्ता त्वगेलापत्रकुङ्कुमम्॥90॥


[दक्षिण-स्तम्भ]

शाणोन्मितं स्यादेकैकं चूर्णयेत् सर्वमेकतः। ततस्तत् प्रक्षिपेच्चूर्णं पक्वखण्डे च तत्समे॥91॥ मोदकान् पलिकान् कृत्वा प्रयुञ्जीत यथोचितान्। हन्यात् सर्वाणि कुष्ठानि त्रिदोषप्रभवामयान्॥92॥ भगन्दरप्लीहगुल्मजिह्वातालुगलामयान् । शिरोऽक्षिभ्रूगतान् रोगान् हन्यात्पृष्ठगतानपि॥93॥ प्राग्भोजनस्य देयं स्यादधःकायस्थिते गदे। भेषजं भक्तमध्ये च रोगे जठरसंस्थिते॥94॥ भोजनस्योपरि ग्राह्यमूर्ध्वजत्रुगदेषु च। त्रिफला चूर्ण आठ पल (बत्तीस तोला), शुद्ध भिलावा चार पल, बाकुची का चूर्ण पाँच पल, वायविडंग का चूर्ण चार पल, लोहभस्म, निसोत (सफेद) का चूर्ण, शुद्ध गूगल तथा शिलाजीत एक-एक पल, पोहकरमूल का चूर्ण आधा पल (दो तोला), चीता की जड़ का चूर्ण आधा पल, मरिच का चूर्ण दो शाण (आधा तोला), सोंठ, पीपल, नागरमोथा, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता तथा केसर का चूर्ण एक-एक शाण (1.4 तोला) लें। फिर उक्त सभी द्रव्यों के चूर्ण के समान भाग चीनी की चासनी में सब चूर्ण डालकर और मिलाकर एक-एक पल (चार तोला) के मोदक या लड्डू बना लें। इनका प्रयोग आवश्यकतानुसार करें। ये सब प्रकार के कुष्ठों, वात, पित्त तथा कफ के रोगों, भगन्दर, प्लीहा, गुल्म, जीभ, तालु, गले, शिर, आँख, भौंह के रोगों तथा पीठ के रोगों को नष्ट करता है। इसे शरीर के अधोभाग के रोगों में भोजन के पहले, मध्यभाग के रोगों में भोजन के मध्य में और ऊर्ध्वजत्रु के रोगों में भोजन के पश्चात् देना चाहिये।

काञ्चनार गुग्गुलु काञ्चनारत्वचो ग्राह्यं पलानां दशकं बुधैः॥95॥ त्रिफला षट्पला कार्या त्रिकटु स्यात् पलत्रयम्। पलैकं वरुणं कुर्यादेलात्वक्पत्रकं तथा॥96॥ एकैकं कर्षमात्रं स्यात् सर्वाण्येकत्र चूर्णयेत्। यावच्चूर्णमिदं सर्वं तावन्मात्रस्तु गुग्गुलुः॥97॥ सङ्कुट्य सर्वमेकत्र पिण्डं कृत्वा च धारयेत्। गुटिकाः शाणिकाः कार्याः प्रातर्ग्राह्या यथोचितम्॥98॥ गण्डमालां जयत्युग्रामपचीमर्बुदानि च। ग्रन्थीन् व्रणांश्च गुल्मांश्च कुष्ठानि च भगन्दरम्॥99॥ प्रदेयश्चानुपानार्थं क्वाथो मुण्डतिकाभवः। क्वाथः खदिरसारस्य पथ्याक्वाथोष्णकं जलम्॥100॥