भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 356 में से

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पृष्ठ 172

136 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे तथा शूल को तथा पाढल की छाल के क्वाथ के साथ सेवन अम्लं तीक्ष्णमजीर्णं च व्यवायं श्रममातपम्। करने से चूहे के विष (प्लेग) को (देखें-सु० क० अ० 7) मद्यं रोषं त्यजेत् सम्यग्गुणार्थी पुरसेवकः ।।81।। जीतता है, त्रिफला के क्वाथ से आँख की भीषण पीड़ा को त्रिफला (बीजरहित) तीन सेर, गिलोय एक सेर, दोनों तथा पुनर्नवादि क्वाथ के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के को कूटकर लोहपात्र (कड़ाही) में डेढ़ द्रोण (चौबीस सेर) उदररोगों को नष्ट करता है। जल में मन्द अग्नि से पकायें। जब आधा जल रह जाये तो वक्तव्य-उक्त योग आयुर्वेद का एक प्रसिद्ध योग है। कपड़े से छानकर क्वाथ ले लें। तदनन्तर इस क्वाथ में शुद्ध इसने अपने अद्भुत गुणों द्वारा मानव-समाज के हृदय में गूगल एक प्रस्थ (सेर) डालकर करछुल से बार-बार हिलाते अपना घर बना लिया है और आयुर्वेद का सिर ऊँचा कर रखा हुये धीमी आँच से पुनः पकायें। जब गुडपाक के समान गाढ़ा है। ज्ञात होता है कि आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व जब हो जाये तो इसमें निम्नलिखित द्रव्यों का कपड़छान चूर्ण भावमिश्र ने भावप्रकाश की रचना की थी, तब इसमें धातुओं मिला दें-त्रिफला दो पल (दो छटाँक), गिलोय एक पल का योग नहीं होता था। उसके बाद किसी चतुर चिकित्सक (एक छटाँक), त्रिकटु छः कर्ष (साढ़े सात तोला), वायविडंग द्वारा उक्त सात द्रव्य (बंग आदि) मिलाने की प्रथा चला दी आधी छटाँक (आधा पल), दन्ती एक कर्ष (डेढ़ तोला)। है, जिससे सोने में सुगन्धित का संयोग बन गया है। इसके इसके पश्चात् सम्पूर्ण औषध का एक पिण्ड बनाकर घी के द्रव्यों को विधिपूर्वक जुटाकर आवश्यकतानुसार घी डालकर पात्र में रख लें अथवा एक-एक शाण की गोलियाँ बना लें। सवा लाख चोटों से कूटना चाहिये और दो-दो रत्ती की गोलियाँ फिर दोष, देश एवं कालादि के अनुसार इन गोलियों का बना लेनी चाहिये। प्रयोग करें और अनुपान में उष्णजल, दूध, मञ्जिष्ठादि क्वाथ कैशोर गुग्गुलु अथवा जो युक्तियुक्त समझें, प्रयोग करें। यह योग सभी प्रकार त्रिफलायास्त्रयः प्रस्थाः प्रस्थैका चामृता भवेत् ।।70।। के कुष्ठों, त्रिदोषजनित वातरक्त, सभी प्रकार के व्रणों, गुल्म, सङ्कुट्य लोहपात्रे तु सार्धद्रोणाम्बुना पचेत्। प्रमेहपिडिकाओं, प्रमेह, उदररोग, मन्दाग्नि, कास-श्वास, शोथ, जलमर्धशृतं ज्ञात्वा गृह्णीयाद् वस्त्रगालितम् ।।71।। पाण्डुरोग तथा सब रोगों को नष्ट करता है। बहुत दिनों तक ततः क्वाथे क्षिपेच्छुद्धं गुग्गुलुं प्रस्थसम्मितम्। सेवन करने से यह रसायन अर्थात् जरा-व्याधि नाशक है। पुनः पचेदयःपात्रे दर्या सङ्घट्टयेन्मुहुः ।।72।। इस योग का नाम 'कैशोरगुग्गुल' है। यह कान्तिकारक अर्थात् सान्द्रीभूतं च तं ज्ञात्वा गुडपाकसमाकृतिम्। भ्राजक पित्त को उत्तेजित करके शरीर को कान्तियुक्त बनाता चूर्णीकृत्य ततस्तत्र द्रव्याणीमानि निक्षिपेत् ।।73।। है। वासादि क्वाथ के साथ सेवन करने से नेत्र रोगों को, त्रिफला द्विपला ज्ञेया गुडूची पलिका मता। वरुणादि क्वाथ से गुल्मादि रोगों को तथा खैरसार के क्वाथ षडक्षं त्र्यूषणं प्रोक्तं विडङ्गानां पलार्धकम् ।।74।। से व्रण तथा कुष्ठों को नष्ट करता है। दन्ती कर्षमिता कार्या त्रिवृत्कर्षमिता स्मृता। ततः पिण्डीकृतं सर्वं घृतपात्रे विनिक्षिपेत् ।।75।। पथ्य-कैशोर गुग्गुलु आदि योगों का सेवन करने वाला गुटिकाः शाणमात्रेण युञ्ज्याद् दोषाद्यपेक्षया। मनुष्य यदि उससे ठीक-ठीक लाभ उठाना चाहे तो अम्ल अनुपाने भिषग्दद्यात् कोष्णं नीरं पयोऽथवा ।।76।। (खट्टे) पदार्थ, तीक्ष्ण (मरिचादि) पदार्थ, अजीर्ण (अनपच), मञ्जिष्ठादिश्रुतं वापि युक्तियुक्तमतः परम्। व्यायाम (कसरत), श्रम (परिश्रम), धूप (घाम), मद्य तथा जयेत् सर्वाणि कुष्ठानि वातरक्तं त्रिदोषजम् ।।77।। क्रोध का त्याग करे। सर्वव्रणानि गुल्मानि प्रमेहपीडिकास्तथा। प्रमेहोदरमन्दाग्निकासश्वयथुपाण्डुजान् ।।78।। वक्तव्य-इस योग में हमने सरलता की दृष्टि से प्रस्थ हन्ति सर्वामयानित्यमुपयुक्तो रसायनः। को सेर, पल को छटाँक एवं अक्ष तथा कर्ष को सवा तोला कैशोरकाभिधानोऽयं गुग्गुलुः कान्तिकारकः ।।79।। लिखा है। इस योग की भी घी देकर खूब कुटाई करनी वासादिना नेत्रगदान् गुल्मादीन् वरुणादिना। चाहिये, क्योंकि गूगल के योग जितने ही कूटे जाते हैं उतने ही क्वाथेन खदिरस्यापि व्रणकुष्ठानि नाशयेत् ।।80।। गुणवान् होते हैं। ध्यान दें-'मर्दनं गुणवर्धनम्'।