भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः] वटककल्पना 135 सोंचर नमक, विरिया नमक, समुद्र नमक, साँभर नमक तथा सफेद निसोत प्रत्येक दो-दो तोला, दन्ती, कचूर, पोहकरमूल, वायविडंग, अनारदाना, हरड़, चीता की जड़, अम्लवेत तथा सोंठ प्रत्येक चार-चार तोला, इन सब द्रव्यों का सूक्ष्म चूर्ण बनाकर बिजौरा निम्बू अथवा कागजी निम्बू के रस के साथ घोटकर गोलियाँ बना लें और घी में मिलाकर दूध के साथ, मद्यों (आसव-अरिष्टों) के साथ अम्लपदार्थों (काञ्जी तथा शिकञ्जी आदि) के साथ अथवा उष्ण जल के साथ सेवन करे। महर्षि काङ्कायन की कही हुई यह गोली 'काङ्कायन बटी' कहलाती है। यह गरम जल के साथ गुल्म (वायुगोला) को, मठा के साथ वातज गुल्म को, गोदुग्ध के साथ पित्तज गुल्म को, गोमूत्र के साथ कफज गुल्म को, दशमूल के क्वाथ के साथ त्रिदोषज गुल्म को और ऊँटनी के दूध के साथ स्त्रियों के रक्तगुल्म को नष्ट करती है। यथोचित अनुपान के साथ हृदय रोग, ग्रहणी रोग, शूल, क्रिमि तथा बवासीर को नष्ट करती है। योगराज गुग्गुलु नागरं पिप्पलीमूलं पिप्पली चव्यचित्रकौ ।। ५६ ।। भृष्टं हिङ्ग्वजमोदा च सर्षपो जीरकद्वयम्। रेणुकेन्द्रयवाः पाठा विडङ्गं गजपिप्पली ।। ५७ ।। कटुकातिविषा भार्गी वचा मूर्वे त्रिभागतः । प्रत्येकं शाणिकानि स्युर्द्रव्याणीमानि विंशतिः ।। ५८ ।। द्रव्येभ्यः सकलेभ्यश्च त्रिफला द्विगुणा भवेत् । एभिश्ूर्णीकृतैः सर्वैः समो देयश्च गुग्गुलुः ।। ५९ ।। (वङ्गं रौप्यं च नागं च लोहसारस्तथाभ्रकम्। मण्डूरं रससिन्दूरं प्रत्येकं पलसम्मितम् ।। ६० ।। गुडपाक्समं कृत्वा दद्यादेतद् यथोचितम् । एकपिण्डं ततः कृत्वा धारयेद् घृतभाजने ।। ६१ ।। गुटिकाः शाणमात्रास्तु कृत्वा ग्राह्या यथोचिताः । गुग्गुलुर्योगराजोऽयं त्रिदोषघ्नो रसायनः ।। ६२ ।। मैथुनाहारपानानां त्यागो नैवात्र विद्यते। सर्वान् वातामयान् कुष्ठानर्शांसि ग्रहणीगदम् ।। ६३ ।। प्रमेहं वातरक्तं च नाभिशूलं भगन्दरम्। उदावर्तं क्षयं गुल्ममपस्मारमुरोग्रहम् ।। ६४ ।। मन्दाग्निं श्वासकासांश्च नाशयेदरुचिं तथा। रेतोदोषहरः पुंसां रजोदोषहरः स्त्रियाम् ।। ६५ ।। पुंसामपत्यजनको वन्ध्यानां गर्भदस्तथा। रास्नादिक्वाथसंयुक्तो विविधं हन्ति मारुतम् ।। ६६ ।। काकोल्यादिश्रुतात् पित्तं कफमारग्वधादिना । दार्वाश्रुतेन मेहांश्च गोमूत्रेण च पाण्डुताम् ।। ६७ ।। मेदोवृद्धिं च मधुना कुष्ठं निम्बश्रुतेन वा। छिन्नाक्वाथेन वातास्रं शोथं शूलं कणाश्रुतात् ।। ६८ ।। पाटलाक्वाथसहितो विषं मूषकजं जयेत्। त्रिफलाक्वाथसहितो नेत्रार्त्ति हन्ति दारुणाम् ।। ६९ ।। पुनर्नवादिक्वाथेन हन्यात् सर्वोदराण्युपि ।) सोंठ, पीपल, चव्य, पीपलामूल, चीता की जड़, भुनी हींग, अजमोदा, सरसों, जीरा, काला जीरा, रेणुका (मेवड़ी) के बीज, इन्द्रजौ, पाठा, वायविडंग, गजपीपल, कुटकी, अतीस, भारंगी, वच तथा मरोड़फली ये बीस द्रव्य प्रत्येक एक-एक शाण (सब मिलाकर 5 तोला), इन सब द्रव्यों से दुगुना (10 तोला) त्रिफला का चूर्ण और इन सब द्रव्यों के समान (15 तोला) शुद्ध गूगल लें। वंगभस्म, रौप्य (चाँदी) की भस्म, नाग (सीसा) भस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, मण्डूरभस्म तथा रससिन्दूर ये प्रत्येक 4-4 तोला। सबसे पहले गूगल को जल में डालकर धीमी आँच द्वारा पिघलाकर उपर्युक्त सब द्रव्य कपड़छन करके मिला दें अथवा एक-एक शाण (चार-चार आना) भर की अथवा यथोचित (जितनी उचित समझें, अर्थात् एक-एक आना भर की अथवा इससे भी छोटी) सुरूप गोलियाँ बनाकर उन्हें सुखाकर रख लें। इस योग का नाम 'योगराज गुग्गुलु' है। यह त्रिदोषनाशक तथा रसायन योग है। इसके सेवन करते समय मैथुन तथा किसी भी प्रकार के आहार एवं पेय-पदार्थों का परहेज नहीं है। यह वायु के सब रोगों, अठारह प्रकार के कुष्ठों, सभी प्रकार के बवासीरों, ग्रहणीरोग, प्रमेह, वातरक्त, नाभिशूल, भगन्दर, उदावर्त, क्षय, अपस्मार (मिरगी), उरोग्रह (हृदय तथा फुफ्फुस की जकड़न), मन्दाग्नि, श्वास, कास तथा अरुचि को नष्ट करता है। पुरुषों के वीर्य दोषों को तथा स्त्रियों के रज-सम्बन्धी दोषों को हरता है। पुरुषों के शुक्र में सन्तानोत्पादक शक्ति और स्त्रियों को गर्भ ग्रहण की शक्ति देता है। रास्नादि क्वाथ (देखें-शा० सं० म० खं० 2) के साथ सेवन करने से अनेक प्रकार के वातरोगों को, काकोल्यादि क्वाथ के साथ सेवन करने से पित्तरोगों को, आरग्वधादि क्वाथ के साथ सेवन करने से कफरोगों को, दारुहल्दी के क्वाथ से प्रमेहों को, गोमूत्र के साथ सेवन करने से पाण्डुरोग को, जल में मधु मिलाकर सेवन करने से मेदोवृद्धि को, नीम की छाल के क्वाथ के साथ सेवन करने से कुष्ठ को, गिलोय के क्वाथ से वातरक्त को, पीपल के क्वाथ से शोथ