शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः] अवलेहकल्पना 141
[बायाँ स्तम्भ]
क्षीरकाकोली (अभाव में नागौरी असगन्ध द्विगुण), कमल, मेदा तथा महामेदा (अभाव में शतावरी द्विगुण), छोटी इलायची, अगरु (अगर) तथा सफेद चन्दन। ये प्रत्येक द्रव्य 4-4 तोला लेकर दरदरा चूर्ण बना लें, फिर सबको कड़ाही में डालकर पाँच सौ आँवले (देशी) तथा एक द्रोण (12 सेर, 3 पाव, 4 तोला) जल डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें; आठवाँ भाग शेष रहने पर क्वाथ को छान लें। उन आँवलों की गुठली निकालकर हाथों से कपड़े में मलकर पीठी निकाल लें। फिर पीठी को सात पल (28 तोला) घी में डालकर मन्द अग्नि द्वारा कुछ भूनकर और उक्त क्वाथ डाल दें। तत्पश्चात् चीनी या मिश्री आधी तुला (ढाई सेर) डालकर अवलेह के समान तैयार कर लें, फिर उसमें पीपल का चूर्ण दो पल (आठ तोला), वंशलोचन का चूर्ण चार पल (16 तोला) और दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपत्ता तथा नागकेसर का चूर्ण प्रत्येक 3-3 शाण (पौन-पौन तोला या 12-12 आना भर) डालकर भली-भाँति मिला दें और सर्वथा शीतल होने पर मधु 6 पल (24 तोला) डालकर मिलाकर दें।
यह च्यवन नामक महर्षि के लिए कहा हुआ 'च्यवनप्राश' अवलेह है। इसको रोगी के अग्नि (पाचनशक्ति) बल को देखकर उचित मात्रा में सेवन करायें। क्षीण (जिसकी धातुओं का क्षय हो चुका है) मनुष्य के लिए यह रसायन है। बालक, वृद्ध, क्षत (घायल तथा उरःक्षत के रोगी), क्षीण, स्त्रीसेवन से (अति मैथुन करने से) क्षीण, शोषी (जिनके रस आदि धातु सूख गये), हृदय रोगी तथा जो स्वरभेद से पीड़ित हैं, उनमें इसका प्रयोग किया जाता है। यह अवलेह, कास, श्वास, प्यास, वातरक्त, उरोग्रह (फुफ्फुस तथा हृदय की गति में रुकावट), वात, पित्त के विकार, शुक्रदोष (वीर्य-विकार) तथा मूत्रदोष (वृक्क आदि अवयवों की विकृति से होने वाले मूत्र-विकार) को नष्ट करता है। इसका (रसायन-विधि से) सेवन करने से मनुष्य मेधा (बुद्धि), स्मृति (स्मरण-शक्ति), स्त्रियों में हर्ष (मैथुन-सामर्थ्य), कान्ति (छवि) तथा वर्ण (रंग) की प्रसन्नता (सफाई आदि का विनाश) को प्राप्त करता है और जरा (बुढ़ापा) से रहित हो जाता है।
वक्तव्य— च्यवनप्राश का निर्माण करने के लिए देशी आँवले लालिमायुक्त लेने चाहिये। ऐसे आँवले माघ के महीने में मिल सकते हैं। क्वाथ करते समय आँवलों को ढीली पोटली में बाँधकर पकाना चाहिये। इसके लिए लोहे का
[दायाँ स्तम्भ]
अथवा ताम्र का कलई किया हुआ पात्र होना चाहिये। क्वाथ द्रव्यों को आठ पहर तक भिगाकर रखना चाहिये। प्रक्षेप के द्रव्यों का चूर्ण कपड़छन कर लेना उचित है। इसके सेवन से प्रारम्भ में किसी-किसी को स्वप्नदोष हो जाया करता है, इससे घबड़ाकर औषध छोड़ देना भूल है, क्योंकि कुछ दिनों के पश्चात् उक्त दोष स्वयं शान्त हो जाता है। यह योग च० चि० अ० 1 का है। केवल पाठ में कुछ परिवर्तन किया गया है। जैसे तेल छः पल (24 तोला) निकाल दिया गया और घी छः के स्थान में सात पल कर दिया गया है। महर्षि चरक ने 'कुटीप्रावेशिक' विधि से इस रसायन का सेवन करने की आज्ञा दी है। देखें—च० चि० अ० 1।
कूष्माण्डावलेह
निष्कुलीकृत्य कूष्माण्डखण्डात् पलशतं पचेत् ।। 22 ।। निक्षिप्य द्वितुलं नीरमर्धशिष्टं च गृह्यते। तानि कूष्माण्डखण्डानि पीडयेद् दृढवाससा ।। 23 ।। आतपे शोषयेत् किञ्चिच्छूलाग्रैर्बहुशो व्यधेत्। क्षिप्त्वा ताम्रकटाहे च दद्यादष्टपलं घृतम् ।। 24 ।। तेन किञ्चिद्भर्जयित्वा पूर्वोक्तं तज्जलं क्षिपेत्। खण्डात् पलशतं दत्त्वा सर्वमेकत्र पाचयेत् ।। 25 ।। सुपक्वे पिप्पली शुण्ठी जीरकं द्विपलं पृथक्। पृथक्पलाद्धं धान्याकं पत्रैला मरिचं त्वचम् ।। 26 ।। चूर्णीकृत्य क्षिपेत् तत्र घृतार्धं क्षौद्रमावहेत्। खादेदग्निबलं दृष्ट्वा रक्तपित्ती क्षयी ज्वरी ।। 27 ।। शोषतृष्णाभ्रमच्छर्दिश्वासकासक्षतातुरः । कूष्माण्डकावलेहोऽयं बालवृद्धेषु युज्यते ।। 28 ।। उरःसन्धानकृद् वृष्यो बृंहणो बलकृन्मतः।
कूष्माण्ड (सफेद पेठा) को बीज रहित करके, छिलका निकालकर टुकड़े-टुकड़े काटकर सौ पल (5 सेर) लें और दुगुना जल डालकर पकायें, आधा जल शेष रहने पर उतार लें, फिर उन टुकड़ों को मोटे तथा मजबूत कपड़े में रखकर निचोड़ लें और धूप में थोड़ा सुखाकर सुइयों के अग्रभागों से भली-भाँति कूँचना चाहिये, फिर इनको कलई की हुई ताँबे की कड़ाई में आठ पल (32 तोला) घी डालकर थोड़ा भून लेना चाहिये। तत्पश्चात् इनमें उस जल को, जिसमें कूष्माण्ड खण्ड पकाये गये थे, डाल दें और सौ पल (5 सेर) चीनी डालकर अवलेह की विधि से पकायें। जब पक जाये तो उतारकर उसमें पीपल, सोंठ तथा भुना हुआ सफेद जीरा का