भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 198, कुल 356 में से

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पृष्ठ 198

162 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

अतीस, नागरमोथा तथा इन्द्रजौ इन सबको दस-दस पल (40-40 तोला) लेकर जौकुट करके चार द्रोण (51 सेर 16 तोला) जल में पकायें, चतुर्थांश शेष रहने पर कटुतैल (1 आढक या 3 सेर 16 तोला) तथा चक्रमर्द (पवाड़) का रस (1 आढक अर्थात् तैल के समान भाग) मिलाकर मन्द-मन्द अग्नि से विधिपूर्वक पाक करें और तेलमात्र शेष रह जाने पर छान लें। इस तेल में (तेल से चतुर्थांश) सिन्दूर डालकर थोड़ा पकायें। उसमें ज्योंही कालापन आ जाये त्योंही उतार लें। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट करता है।

निर्गुण्डी लांगली तैल निर्गुण्डीस्वरसे तैलं लाङ्गलीमूलकल्कितम् ।। 195 ।। तैलं नस्यान्निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्। निर्गुण्डी (सम्भालू) का स्वरस (4 सेर), तेल (1 सेर) और कलिहारी का कल्क (9 पाव) इन सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करना चाहिये। यह तेल नस्य-विधि से प्रयोग करने से भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही नष्ट कर देता है।

चक्रमर्द तैल (चक्रमर्दक मूलस्य कल्कं कृत्वा विपाचयेत् ।। 196 ।। केशराजरसे तैलं कटुकं मृदुनाग्निना। पाकशेषे विनिक्षिप्य सिन्दूरमवतारयेत् ।। 197 ।। एतत्तैलं निहन्त्याशु गण्डमालां सुदारुणाम्।) चकवड़ की जड़ का कल्क (1 पाव) बनाकर भाँगरा के रस (4 सेर) में कड़वा तेल (1 सेर) डालकर तीनों को एक साथ मन्द अग्नि में पाक करें। जब तेल मात्र अवशिष्ट रह जाये तो तेल को छान लें। इस तेल में चतुर्थांश सिन्दूर डालकर थोड़ा पकाकर उतार लें (यह काले रंग का मलहम तैयार हो जाता है)। यह तेल भयानक गण्डमाला को शीघ्र ही शान्त कर देता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकार के छोटे-बड़े फोड़ों या घावों पर यह आश्चर्यजनक कार्य करता है। इसमें एक विशेषता यह है कि यह सूखा-सा रहता है और थोड़ा गर्म करने से ढीला हो जाता है, जिससे लगाने में सरलता होती है।

वक्तव्य-यह चक्रमर्द तेल अत्यन्त उपयोगी है। अतः हमने यहाँ इसे उद्धृत किया है।

धत्तूर तैल (धत्तूररसमादाय हयमारान्तिकारसम् ।। 198 ।। भृङ्गराजरसश्चैव सारिणी निम्बपत्रकम्। शोभाञ्जनश्वित्रकश्च अश्वगन्धा प्रसारिणी ।। 199 ।। शिरीषः कुटजोऽनन्ता शाल्मली नक्तपत्रकम्। रविप्रियो महानिम्बो डिण्डिघोषा महेरणा ।। 200 ।। बला ज्योतिष्मती चैव श्यामाकश्चक्रमर्दकः। एतैस्तु रसमादाय तैलतुल्यं च दीयते ।। 201 ।। देवदारु हरिद्रे द्वे मांसी कुष्ठं सचन्दनम्। मरिचं त्रिवृता दन्ती हरितालं मनःशिला ।। 202 ।। कम्पिल्लको गन्धकश्च खदिरः पिप्पली वचा। रसाञ्जनं च सिन्दूरं श्रीवासो रक्तचन्दनम् ।। 203 ।। इरिमेदस्तथा तुम्बी मञ्जिष्ठा सिन्दुवारकः। करवीरजटा रास्ना विश्वा श्रेष्ठा च पौष्करम् ।। 204 ।। शठी तालीसपत्रं न प्रियङ्गुः रेणुका तथा। चातुर्जातकसञ्झीरं कङ्कोलं जातिपत्रिका ।। 205 ।। ज्योतिष्मती च पलिका विषस्य द्विपलं भवेत्। आढकं कटुतैलस्य गोमूत्रं च चतुर्गुणम् ।। 206 ।। मृत्पात्रे लोहपात्रे च शनैर्मृद्वग्निना पचेत्। मज्जाश्रितं त्वग्गतं च वातं चास्थिगतं तथा ।। 207 ।। ऊरुग्रहं चाढ्यवातं कृच्छ्रं दण्डापतानकम्। कुब्जत्वं चाथ शोथं च पक्षाघातं तथार्दितम् ।। 208 ।। हनुस्तम्भं शिरःकम्पं मूर्च्छितं दृष्टिविभ्रमम्। अपस्मारं तथोन्मादं तथा चैवाऽपतन्रकम् ।। 209 ।। आक्षेपकं चास्थिभग्नं सन्धिभग्नं च नाशयेत्।)

इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे घृततैलकल्पना नाम नवमोऽध्यायः ।। 9 ।।

धतूरा के पत्तों का रस, कनेर के पत्तों का रस, भाँगरा का रस, रक्तवर्ण की पुनर्नवा, नीम के पत्ते, सहजन की छाल, चीता, असगन्ध, गन्धप्रसारिणी, सिरस, कुरैया, जवासा, सेमल, करञ्ज के पत्ते, लाल कमल, बकायन, ऐरण्ड की जड़, सलई वृक्ष की छाल, बरियारा, मालकंगुनी, काली निसोत तथा चक्रमर्द-इन द्रव्यों का रस तथा क्वाथ लेकर समान भाग तेल में मिला दें, फिर इसमें देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, जटामांसी, कूठ, सफेद चन्दन, मरिच, निसोत, दन्ती, हरिताल, मैनसिल, कबीला, गन्धक, खैरसार, पीपल, वच, रसवत, सिन्दूर,

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