भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 356 में से

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नवमोऽध्यायः] घृततैलकल्पना 163

गन्धाविरोजा, लालचन्दन, दुर्गन्धित खैर, कड़वी तुम्बी, मजीठ, सम्भालू के पत्ते, कनेर की जड़, रास्ना, सोंठ, हरड़, पोहकरमूल, कचूर, तालीसपत्र, फूलप्रियंगु, रेणुका, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, अंजीर, शीतलचीनी, जावित्री तथा मालकंगुनी प्रत्येक एक-एक पल और विष (मीठा तेलिया) दो पल (8 तोला) लेकर कल्क बनायें। कटुतैल एक आढक (3 सेर 16 तोला) और तेल की अपेक्षा चतुर्गुण गोमूत्र, इन सबको मिट्टी अथवा लोहे के पात्र में एक साथ मिलाकर धीरे-धीरे मन्द-मन्द अग्नि से पकाना चाहिये। यह तेल मज्जागत वायु, त्वचागत वायु, अस्थिगत वायु, ऊरुग्रह, आढ्यवात (आमवात), कष्टप्रद दण्डागतानक, कुबड़ापन, शोथ, पक्षाघात, अर्दित (मुख-प्रदेश का लकवा), हनुस्तम्भ (मुँह खुला अथवा बन्द रह जाना), शिरःकम्प, मूर्च्छा, दृष्टि की विकृति, अपस्मार, उन्माद, अपतन्त्रक (हिस्टीरिया), आक्षेपक, अस्थिभग्न तथा सन्धिभग्न को नष्ट करता है।

कटुतैल की मूर्च्छन-विधि—बड़ी हरड़, हल्दी, नागरमोथा, कच्चे बेल की गुदी, दाड़िम, नागकेसर, कालाजीरा, नेत्रबाला, नालुका तथा बहेड़ा (1-1 तोला), मजीठ आठ कर्ष, जल एक आढक, कटुतैल एक प्रस्थ, सबको मिलाकर पकायें। इससे तेल का 'आमदोष' दूर हो जाता है। सभी तेलों को यथासम्भव उक्त विधि से शुद्ध कर लें, उसके बाद तेल पाक करना चाहिये।

तेल की गन्धवृद्धि—कूठ आदि गन्ध द्रव्य, हींग आदि निर्यास द्रव्य और चमेली आदि के फूल यदि तेल में गन्धवृद्धि के लिए डालने हों, तो तेल का पाक हो जाने के बाद ही इन्हें डालना चाहिये। यह प्रक्षेप 'पत्रकल्क' कहा जाता है।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का नवाँ अध्याय समाप्त।।9।।

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