शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः आसवारिष्टकल्पना [बायाँ स्तम्भ / Left Column] सन्धान-कल्पना द्रवेषु चिरकालस्थं द्रव्यं यत्सन्धितं भवेत्। आसवारिष्टभेदैस्तु प्रोच्यते भेषजोचितम्॥१॥ जल आदि द्रवपदार्थ में गुड़, धाय के फूल आदि द्रव्यों के चिरकाल (जितने समय में सन्धान हो) तक पड़े रहने से सन्धान (विशेष प्रकार के रस एवं गन्ध आदि की उत्पत्ति) होने के कारण जो सन्धित द्रव प्रस्तुत होता है, उसके आसव, अरिष्ट, सीधु एवं सुरा आदि नाम हैं और ये द्रव औषधियों (जिनके योग से ये आसव-अरिष्ट आदि बनाये जाते हैं) के अनुसार कार्य करते हैं। वक्तव्य-उक्त सभी द्रव मादक होने के कारण 'मद्य' कहे जाते हैं, क्योंकि सभी में मादक तत्त्व अवश्य होता है। आजकल उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इनके 'अर्क' निकालने की विधि का उल्लेख नहीं पाया जाता। केवल 'भैषज्यरत्नावली' नामक संग्रह-ग्रन्थ में 'मृतसञ्जीवनी सुरा' के निर्माण की विधि में 'मृन्मये मोचिकायन्त्रे मयूराख्येऽपि यन्त्रके'। (ज्वराधिकार), कहकर अर्क निकालने का विधान किया गया है। मोचिकायन्त्र तथा मयूरयन्त्र वे ही यन्त्र हैं, जिनकी सहायता से अर्क निकाले जाते हैं। उपयोगी तथा आवश्यक द्रव्यों का सन्धान करके उक्त यन्त्रों द्वारा जो 'अर्क' या 'सारद्रव' निकाला जाता है, उसी को 'शराब' या 'मद्य' कहा जाता है। सन्धान कितने समय में हो जाता है, इसका निश्चित निर्देश नहीं किया जा सकता। अतः आचार्य शार्ङ्गधर ने केवल 'चिरकालस्थ' कहना ही उचित समझा, क्योंकि देश तथा काल के भेद से सन्धान का समय भी भिन्न-भिन्न होता है। यथा-शीतदेश में यदि एक मास में सन्धान होता है, तो उष्ण देश में वही 15 दिनों में हो जाता है। एलोपैथी तथा होमियोपैथी पद्धति के अनुसार 'मद्यसार' [दायाँ स्तम्भ / Right Column] (स्प्रिट) में औषधियाँ डालकर और कुछ समय तक पड़ी रहने देकर औषध (टिंचर) तैयार किये जाते हैं और आयुर्वेद की पद्धति के अनुसार औषधि तथा द्रव के संयोग से सन्धान करके अर्थात् मद्यसार उत्पन्न करके औषधियाँ (आसव, अरिष्ट आदि) तैयार कर ली जाती हैं। आसव, अरिष्ट तथा मद्य के योग से निर्मित औषध मध्यांश के कारण शीघ्र ही अपना प्रभाव प्रदर्शित करते हैं। यथा-'आशुत्वाच्चाशुकर्मकृत्' देखें-सु० उ० अ० 47, श्लोक 5। आसव तथा अरिष्ट का भेद यदपक्वौषधाम्बुभ्यां सिद्धं मद्यं स आसवः। अरिष्टः क्वाथसाध्यः स्यात् तयोर्मानं पलोन्मितम्॥२॥ अपक्व (कच्चे) औषध एवं जल के योग से सन्धान करके जो मद्य तैयार किया जाता है, वह 'आसव' कहलाता है और औषध एवं जल का क्वाथ करके जो मद्य तैयार किया जाता है, वह 'अरिष्ट' कहलाता है। इन दोनों की साधारण मात्रा एक पल (4 तोला) है। वक्तव्य-आसव एवं अरिष्ट के नामकरण सम्बन्धी उक्त परिभाषा की आज्ञा का पालन चरक तथा सुश्रुत में नहीं किया गया है। सम्भव है कि उक्त संहिताओं के निर्माताओं ने उस पर ध्यान न दिया हो, अस्तु! उक्त संहिताओं में इस परिभाषा के विरुद्ध बहुत से उदाहरण मिलते हैं। चरक तथा सुश्रुत में आसव एवं अरिष्टों के पान का समय तथा विधि वही है, जो मद्यपान की कही गयी है। देखें-च० चि० अ० 24। अरिष्टों में जल, गुड़ तथा मधु का मान अनुक्तमानारिष्टेषु द्रवद्रोणे तुलां गुड़म्। क्षौद्रं क्षिपेद् गुडादर्धं प्रक्षेपं दशमांशकम्॥३॥ जिन अरिष्टों (आसव, सुरा आदि) में द्रव्यों के मान (तौल) का उल्लेख न हो, उनमें इस प्रकार द्रव्यों का योग