शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 202, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें166 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे विनष्ट तथा चुक्र लक्षण विनष्टमम्लतां यातं मद्यं वा मधुरद्रवम् ।। ४ ।। विनष्टः सन्धितो यस्तु तच्चुक्रमभिधीयते । मद्य अथवा इक्षुरस आदि मधुर द्रव जब खट्टे हो जाते हैं तो उन्हें 'विनष्ट' (मर गया या बिगड़ गया) कहा जाता है, किन्तु यदि विनष्ट होने पर भी उसमें सन्धान (खमीर) हो जाये तो उसे 'चुक्र' कहा जाता है। मधुशुक्त बनाने की विधि जम्बीराणां फलरसः प्रस्थैकः कुडवोन्मितम् ।। ९ ।। माक्षिकं तत्र दातव्यं पलैका पिप्पली स्मृता। एतदेकीकृतं सर्वं मृद्भाण्डे च निधापयेत् ।। १० ।। यवाम्भो मधुसंयुक्तं शृङ्गबेरगुडान्वितम् । धान्यराशौ त्रिरात्रिस्र्थं मधुशुक्तमुदाहृतम् ।। ११ ।। जम्बीरी नींबूओं का रस एक प्रस्थ (64 तोला), मधु एक कुडव (16 तोला) और पिप्पली एक पल (4 तोला) इन सब को मिट्टी के पात्र में भरकर तीन अथवा सात दिन तक रख दें। इस प्रकार 'मधुशुक्त' तैयार हो जाता है। जौ का क्वाथ (एक प्रस्थ-64 तोला), मधु (एक कुडव=16 तोला), शृंगबेर तथा गुड़ दोनों एक-एक पल (4-4 तोला) मिट्टी के पात्र में डालकर उसका मुख बन्द करके तीन दिन तक धान्यराशि (गेहूँ आदि के ढेर अथवा भूसी में) दबाकर रख दें। इसे भी 'मधुशुक्त' कहा जाता है। वक्तव्य- उक्त दोनों विधियों से 'मधुशुक्त' बनाया जाता है। गुड़शुक्त का लक्षण गुदाम्बुना सतैलेन कन्दमूलफलैस्तथा। सन्धितं चाम्लतां यातं गुड़शुक्तं तदुच्यते ।। १२ ।। गुड़ (1 पाव), जल (2 सेर), तेल युक्त पदार्थ राई एवं बड़े आदि, कन्द (आलु, जिमीकन्द आदि) मूल (मूली, गाजर आदि) एवं फलों (लौकी आदि) के संयोग से जो सन्धान करके अम्लद्रव (खट्टा जल) तैयार किया जाता है, उसे 'गुड़शुक्त' कहा जाता है। वक्तव्य- यह भी एक प्रकार की काञ्जी ही है। इसमें यद्यपि नमक डालने की चर्चा नहीं की गयी, फिर भी नमक अवश्य डालना चाहिये। शुक्त का लक्षण एवमेवेक्षुशुक्तं स्यान्मृद्वीकासम्भवं तथा। इसी प्रकार ईख के रस, मुनक्का या अंगूर के रस का भी 'शुक्त' बनाया जाता है। तुषाम्बु तथा सौवीर का लक्षण तुषाम्बु सन्धितं ज्ञेयमामैर्विदलि तैरयवैः ।। १३ ।। यवैस्तु निस्तुषैः पक्ववैः सौवीरं सन्धितं भवेत् । कच्चे एवं दले हुये जौ का सन्धान करने से जो द्रव तैयार किया जाता है उसे 'तुषाम्बु' कहा जाता है। तुष रहित (छड़े हुये) परिपक्व जौ का सन्धान करने से जो द्रव तैयार किया जाता है, वह 'सौवीर' होता है। वक्तव्य- 'तुषाम्बु' तथा 'सौवीर' ये दोनों नाम जौ की मद्य के हैं। इसका प्रचार पर्वतीय प्रदेशों (नैनीताल, शिमला आदि) में बहुत अधिक देखने में आता है, किन्तु कुछ लोग इन्हें 'काञ्जी' का भेद मानते हैं। सुश्रुत ने कहा है- 'षड्रात्रात् सप्तरात्राद् वा ते च पेये प्रकीर्तिते'। (सु० सू० अ० 44 श्लोक 45)। अर्थात् ये दोनों मद्य छः-सात दिन में पीने योग्य हो जाते हैं। काञ्जिक का लक्षण कुल्माषधान्यमण्डादि सन्धितं काञ्जिकं विदुः ।। १४ ।। षण्डाकी सन्धिता ज्ञेया मूलकैः सर्षपादिभिः । कुल्माष (उबाले हुये गेहूँ तथा चना आदि) तथा धान्यों (चावल तथा जौ आदि) के माँड (राई, नमक, हल्दी आदि के सन्धान) से बना हुआ द्रव 'काञ्जिक' या 'काञ्जी' कहा जाता है। मूली तथा सरसों या राई आदि से बनायी हुई काञ्जी को 'षण्डाकी' जानना चाहिये। वक्तव्य- उक्त द्रवों का सन्धान दो-चार दिन में ही हो जाता है। आसव से षण्डाकी तक के सम्बन्ध में अधिक परिचय प्राप्त करने के लिए देखें-च० सू० अ० 26, च० चि० अ० 24 एवं सु० सू० अ० 45। सुरा या मद्य-योनि (जिन द्रव्यों से सुरा बनायी जाती है), संस्कार (जिन विधियों से तैयार की जाती है) और नाम (जिन संज्ञा) आदि भेदों के कारण सुरा बहुत प्रकार की होने पर भी एक ही प्रकार की कही जाती है, क्योंकि मद सबमें समान होता है। होमियोपैथिक में औषध-निर्माण विधि- तत्-तत् रोगनाशक औषध द्रव्यों को उत्तम सुरा (स्प्रिट) में डालकर रख दिया जाता है और कुछ समय के बाद छानकर उस सुरा का प्रयोग किया जाता है। इस विधि का उल्लेख च० चि०