भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

दशमोऽध्यायः] आसवारिष्टकल्पना 167 अ० 15 श्लोक 99 में मिलता है। जैसे 'देवदारुव- चामुस्तनागरातिविषाऽभयाः। वारुण्यामासुताः'। अर्थात् देवदारु, बालवच, नागरमोथा, सोंठ, अतीस एवं हरड़ का वारुणी (सुरा) में आसव बनायें। क्या उक्त चिकित्सापद्धति का मूल आधार यही तो नहीं है? उशीरासव निर्माण-विधि उशीरं बालकं पद्मं काश्मरीं नीलमुत्पलम्। प्रियंगुं पद्मकं लोध्रं मञ्जिष्ठां धन्वयासकम् ।। 15 ।। पाठां किराततिक्तं च न्यग्रोधोदुम्बरं शठीम्। पर्पटं पुण्डरीकं च पटोलं काञ्चनारकम् ।। 16 ।। जम्बूशाल्मलिनिर्यासं प्रत्येकं पलसम्मितान्। भागान् सुचूर्णितान् कृत्वा द्राक्षायाः पलविंशतिम् ।। 17 ।। धातकीं षोडशपलां जलद्रोणद्वये क्षिपेत्। शर्करायास्तुलां दत्त्वा क्षौद्रस्यैकतुलां तथा ।। 18 ।। मासैकं स्थापयेद् भाण्डे मांसीमरिचधूपिते। उशीरासव इत्येष रक्तपित्तविनाशनः ।। 19 ।। पाण्डुकुष्ठप्रमेहार्शःकृमिशोथहरस्तथा । खस, नेत्रबाला, लाल कमल, गम्भार की छाल, नीलकमल (नीलोफर), फूल प्रियंगु, पद्माकाष्ठ, लोध, मजीठ, धमासा, पाठा, चिरायता, बरगद की छाल, गूलर की छाल, कचूर, पित्तपापड़ा, सफेदकमल, परबल की पत्ती, कचनार की छाल, जामुन की छाल तथा सेमल की गोंद (मोचरस) प्रत्येक द्रव्य का 4-4 तोला चूर्ण, द्राक्षा (मुनक्का) बीस पल (80 तोला या 1 सेर), धाय के फूल सोलह (64 तोला), जल दो द्रोण (25 सेर 2 पाव 8 तोला), शर्करा (खाँड़) एक तुला (5 सेर) तथा मधु आधी तुला (2½ सेर)-इन सब द्रव्यों को जटामांसी तथा मरिच से धूप दिये हुये पात्र में डालकर एक मास-पर्यन्त रख छोड़ना चाहिये (इसके पश्चात् निर्मल द्रव को छानकर बोतलों में भर दें)। इस औषध का नाम 'उशीरासव' है। यह रक्तपित्त का विनाश करता है और पाण्डुरोग, कुष्ठ, प्रमेह, अर्श, कृमि तथा शोथ को हरता है। कुमार्यासव (सुपक्वरससंशुद्धं कुमार्याः पत्रमाहरेत् ।। 20 ।। यत्नेन रसमादाय पात्रे पाषाणमृन्मये। द्रोणे गुडतुलां दत्त्वा घृतभाण्डे निधापयेत् ।। 21 ।। माक्षिकं पक्वलोहं च तस्मिन्नर्धतुलां क्षिपेत्। कटुत्रिकं लवङ्गं च चातुर्जातकमेव च ।। 22 ।। चित्रकं पिप्पलीमूलं विडङ्गं गजपिप्पली। चविकं हपुषा धान्यं क्रमुकं कटुरोहिणी ।। 23 ।। मुस्ता फलत्रिकं रास्ना देवदारु निशाद्वयम्। मूर्वा मधुरसा दन्ती मूलं पुष्करसम्भवम् ।। 24 ।। बला चातिबला चैव कपिकच्छूस्त्रिकण्टकम्। शतपुष्पा हिङ्गुपत्री आकल्लकमूटिङ्गणम् ।। 25 ।। पुनर्नवाद्वयं लोध्रं धातुमाक्षिकमेव च। एषां चार्धपलं दत्त्वा धातक्यास्तु पलाष्टकम् ।। 26 ।। पलं चार्धपलं चैव पलद्वयमुदाहृतम् । वपुर्वयःप्रमाणेण बलवर्णाग्निदीपनम् ।। 27 ।। बृंहणं रोचनं वृष्यं पक्तिशूलनिवारणम्। अष्टावुदरजान् रोगान् क्षयमुग्रं च नाशयेत् ।। 28 ।। विंशतिं मेहजान् रोगानुदावर्तमपस्मृतिम् । मूत्रकृच्छ्रमपस्मारं शुक्रदोषं तथाश्मरीम् ।। 29 ।। कृमिजं रक्तपित्तं च नाशयेत् तु न संशयः।) घीकुआर के परिपक्व रसयुक्त तथा साफ सुथरे पत्तों का संग्रह करें, प्रयत्न के साथ उनका रस निकालकर पत्थर अथवा घृतलिप्त मृत्तिका पात्र में डाल दें। उक्त रस एक द्रोण (12 सेर 3 पाव 4 तोला), गुड़ एक तुला (5 सेर), मधु आधा तुला (2½ सेर), लोहभस्म आधी तुला (2½ सेर), सोंठ, मरिच, पीपल, लौंग, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, चीता का जड़, पीपलामूल, वायविडंग, गजपीपल, चाव, हाऊबेर, धनियाँ, सुपारी, कुटकी, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आँवला, रासना, देवदारु, हल्दी, दारुहल्दी, मरोड़फली, मुलेठी, दन्ती, पोहकरमूल, बरियारा, अतिबला, कंची, किवाँच के बीज, गोखरू, सौंफ, हिङ्गपत्री, अकरकरा, उतंगण, पुनर्नवा, रक्तपुनर्नवा, लोध, सोनामाखी की भस्म (भस्म-निर्माण-विधि शा० सं० म० खं० अ० 11 में देखें) प्रत्येक द्रव्य आधा-आधा पल (2-2 तोला) तथा धाय के फूल आठ पल (32 तोला) इन सब द्रव्यों को उक्त घीकुआर के रस में घोलकर और पात्र का मुख बन्द करके एक मास-पर्यन्त पड़ा रहने दें। जब तैयार हो जाये तो स्वच्छ द्रव छानकर बोतलों में भर दें। इसका नाम 'कुमार्यासव' है। इसकी मात्रा एक पल (4 तोला), आधा पल (2 तोला) अथवा दो पल (8 तोला) तक रोगी के शरीर और आयु को देखकर निश्चित की जाती है। यह आसव बल, वर्ण तथा अग्नि को बढ़ाता है, धातुवर्द्धक है, रुचिकर है, शुक्रवर्द्धक है, परिणामशूल का विनाशक है, आठ प्रकार के उदररोगों, भयानक क्षयरोग, बीस प्रकार के