भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 356 में से

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पृष्ठ 204
168शार्ङ्गधरसंहिता[ मध्यमखण्डे

प्रमेहों, उदावर्त, अपस्मृति (स्मरण-शक्ति की न्यूनता) मूत्रकृच्छ्र, मिरगी, शुक्रधातु के विकारों, पथरी, कृमिरोग तथा रक्तपित्त को विनष्ट करता है। इसमें कोई भी सन्देह नहीं है। वक्तव्य—उक्त आसव में लोह-मिश्रण के विषय में दो मत हैं—(1) कुछ लोगों का कथन है कि इसमें अत्यन्त सूक्ष्म लोह-चूर्ण डालना चाहिये। एक मास में जितना आवश्यक होता है उसमें घुल जाता है और (2) दूसरे लोगों का कथन है कि इसमें लोहभस्म डालनी चाहिये। दोनों ही मत युक्तियुक्त हैं और प्रचलित भी हैं। सच बात यह है कि तेरह सेर द्रव में ढाई सेर लोह डाला जाता है और वह उतना ही या उससे कुछ कम पात्र का पेंदी में पड़ा हुआ मिल जाता है। भले ही भस्म डाली गयी हो अथवा लोहचूर्ण—इससे प्रमाणित होता है कि इतने द्रव में इतना लोह घुल नहीं सकता। कषायरस में लोह को अपने में विलीन करने की शक्ति होती है। अतः उक्त आसव में जितना कषायरस (त्रिफला आदि) होता है, उसके अनुसार उतना-सा लोह विलीन हो जाता है। उक्त आसव अपतन्त्रक या हिस्टीरिया रोग का परमोत्तम औषध है।

पिप्पल्यासव

पिप्पली मरिचं चव्यं हरिद्रा चित्रको घनः॥३०॥ विडङ्गं क्रमुको लोध्रः पाठा धात्र्येलवालुकम्। उशीरं चन्दनं कुष्ठं लवङ्गं तगरं तथा॥३१॥ मांसी त्वगेलापत्रं च प्रियङ्गुर्नागकेशरम्। एषामर्धपलान् भागान् सूक्ष्मचूर्णीकृताञ्शुभान्॥३२॥ जलद्रोणद्वये क्षिप्त्वा दद्याद् गुडतुलात्रयम्। पलानि दश धातक्या द्राक्षा षष्टिपला भवेत्॥३३॥ एतान्येकत्र संयोज्य मृद्भाण्डे च विनिक्षिपेत्। ज्ञात्वाऽऽगतरसं तस्य पाययेदग्न्यपेक्षया॥३४॥ क्षयं गुल्मोदरं कार्श्यं ग्रहणीं पाण्डुतां तथा। अर्शांसि नाशयेच्छीघ्रं पिप्पल्याद्यासवस्त्वयम्॥३५॥

पीपल, मरिच, चव्य, हल्दी, चीता की जड़, मोथा, वायविडंग, सुपारी, लोध, पाठा, आँवला, एलवालुक, खस, श्वेतचन्दन, कूठ, लौंग, तगर, जटामांसी, दालचीनी, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, फूलप्रियंगु तथा नागकेशर प्रत्येक उत्तम द्रव्य आधा-आधा पल (2-2 तोला) लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को दो द्रोण ($2\frac{1}{2}$ सेर 8 तोला) जल में डाल दें और उसमें गुड़ तीन तुला (15 सेर), धाय के फूल दस पल (40 तोला) और द्राक्षा (दाख) साठ पल (3 सेर) इन सभी द्रव्यों को मिट्टी के एक पात्र में भर दें। जब आसव तैयार हो जाये तो उसे छानकर रख लें। इस आसव को रोगी की जठराग्नि का विचार करके पिलाना चाहिये। यह आसव क्षयरोग, गुल्म, उदर, कृशता, ग्रहणीरोग, पाण्डुरोग, तथा बवासीर को शीघ्र ही नष्ट करता है। इसका नाम 'पिप्पल्यासव' है।

लोहासव

लोहचूर्णं त्रिकटुकं त्रिफलां च यवानिकाम्। विडङ्गं मुस्तकं चित्रं चतुःसङ्ख्यापलं पृथक्॥३६॥ धातकीकुसुमानां तु प्रक्षिपेत् पलविंशतिम्। चूर्णीकृत्य ततः क्षौद्रं चतुःषष्टिपलं क्षिपेत्॥३७॥ दद्याद् गुडतुलां तत्र जलद्रोणद्वयं तथा। घृतभाण्डे विनिक्षिप्य निदध्यान्मासमात्रकम्॥३८॥ लोहासवममुं मर्त्यः पिबेद् वह्निकरं परम्। पाण्डुश्वयथुगुल्मानि जठराण्यर्थशांसि रुजम्॥३९॥ कुष्ठं प्लीहामयं कण्डूं कासं श्वासं भगन्दरम्। अरोचकं च ग्रहणीं हृद्रोगं च विनाशयेत्॥४०॥

लोहचूर्ण, सोंठ, मरिच, पीपल, हरड़, बहेड़ा, आँवला, अजवायन, बायविडंग, मोथा तथा चीता की जड़ प्रत्येक द्रव्य चार-चार पल (16-16 तोला) और धाय के फूल बीस पल (1 सेर) लेकर सबका चूर्ण बना लें। मधु साठ पल (3 सेर) गुड़ एक तुला (5 सेर) और जल दो द्रोण ($25\frac{1}{2}$ सेर 8 तोला), उक्त सब द्रव्यों को घृतलिप्त पात्र में डालकर एक मास-पर्यन्त सुरक्षित रखें। तैयार हो जाने पर छानकर बोतलों में भर दें। इस आसव का नाम 'लोहासव' है। इसका पान करने से जठराग्नि दीप्त होती है। यह आसव पाण्डुरोग, शोथ, गुल्म, उदररोग, अर्श की पीड़ा, कुष्ठ, प्लीहारोग, कण्डू (खुजली), कास, श्वास, भगन्दर, अरुचि, ग्रहणीरोग तथा हृद्रोग को विनष्ट करता है। वक्तव्य—इस आसव में भी लौह चूर्ण अथवा भस्म डाली जाती है।

मृद्वीकारिष्ट

(मृद्वीकायाः पलशतं चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत्। द्रोणशेषे सुशीते च पूते तस्मिन् प्रदापयेत्॥४१॥ तुले द्वे क्षौद्रखण्डाभ्यां धातक्याः प्रस्थमेव च। कङ्कोलकं लवङ्गं च फलं जात्यास्तथैव च॥४२॥ पलांशकं च मरिचत्वगेलापत्रकेसरम्। पिप्पली चित्रकं चव्यं पिप्पलीमूलरेणुके॥४३॥