भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 356 में से

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पृष्ठ 209

एकादशोऽध्यायः धातुशोधनमारणकल्पना

धातुओं की संख्या स्वर्णतारारताम्राणि नागवङ्गौ च तीक्ष्णकम्। धातवः सप्त विज्ञेयास्ततस्तान् शोधयेद् बुधः॥१॥ स्वर्ण (सोना), तार (चाँदी), आर (पीतल), ताम्र (ताँबा), नाग (सीसा), वंग (राँगा) तथा तीक्ष्णक (लोह, फौलाद एवं उसके अन्यान्य भेद) ये सात पदार्थ 'धातु' कहे जाते हैं। विद्वान् वैद्य को औषधार्थ प्रयोग करने के लिए इनका शोधन करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त धातुओं को सभी जानते हैं, किन्तु 'आर' की सभी टीकाकारों ने पीतल लिखा है। आप ध्यान दें-पीतल को धातु नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह एक भाग ताँबा तथा दो भाग यशद इन दो धातुओं के योग से बनाया जाता है। यथा-'रीतिरप्युपधातुः स्यात् ताम्रस्य यशदस्य च। पित्तलस्य गुणा ज्ञेयाः स्वयोनिसदृशा बुधैः॥' (आयुर्वेद-प्रकाश अ० ४)। यही बात श्री भावमिश्र ने भी स्वीकार की है। देखें-भा० नि० धातुवर्ग। उक्त दोनों ग्रन्थकारों ने पीतल को उपधातु माना है, यही उचित भी है। यदि इसको धातु मान भी लिया जाये तो कांस्य आदि अन्यान्य मिश्रित पदार्थों को भी धातु मानना पड़ेगा, जो कदापि उचित नहीं है। प्रामाणिक वचन देखें-'सुवर्णे रूप्यकं ताम्रं वङ्गं जसदशीसके। लोहं चैते मताः सप्त धातवो गिरिसम्भवाः॥' (आ०प्र०अ० ३) तथा-'स्वर्णं रूप्यं च ताम्रं च रङ्गं जसद्मेव च। सीसं लोहं च सप्तैते धातवो गिरिसम्भवाः'॥ (भा०प्र०नि० धातुवर्ग)। सात धातुओं में जसद् अर्थात् जस्ता को धातु माना है, जो उचित है। इसलिये आर को धातु मानना चाहिये अथवा नहीं, इसका निर्णय बुद्धिमान् स्वयं कर सकते हैं। यदि कोई दुराग्रही मनुष्य कहे कि पीतल में यशद होता है, अतः उसे धातु मानने में कोई हानि नहीं है, वे भली-भाँति विचार करें।


धातुओं के शोधन की विधि स्वर्णतारारताम्रायः पत्राण्यग्नौ प्रतापयेत्। निषिञ्चेत् तप्तप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके॥२॥ गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं स्वर्णादिलोहानां विशुद्धिः सम्प्रजायते॥३॥ नागवङ्गौ प्रतप्तौ च गालितौ तौ निषेचयेत्। त्रिधा त्रिधा विशुद्धः स्याद् रविदुग्धेन च त्रिधा॥४॥ सोना, चाँदी तथा लोह के पत्रों को अग्नि में तपायें और उनको गर्म-गर्म ही तिलतेल में तक्र (मट्ठा) में, काञ्जी में, गोमूत्र में तथा कुलथी के क्वाथ में तीन-तीन बार बुझायें, इस प्रकार स्वर्ण आदि लोहों (धातुओं) की शुद्धि हो जाती है। नाग (सीसा) तथा वंग (राँगा) को तपाकर (गलाकर) उक्त तेल आदि द्रवों में तीन बार तथा आक के दूध में तीन बार बुझायें। इस प्रकार नाग तथा वंग भी शुद्ध हो जाते हैं। वक्तव्य-सुवर्ण आदि धातुओं के पत्र तो तपाये जा सकते हैं, किन्तु नाग तथा वंग तपते ही पिघल जाते हैं, अतएव इनको पिघलाने का विधान किया गया है। इन्हें पिघलाकर द्रवों में डालते समय अत्यन्त सावधानी की आवश्यकता होती है, अन्यथा वे उछलकर शोधनकर्त्ता के शरीर पर पड़कर हानि पहुँचा सकते हैं, अतः उनका द्रव एक चौड़े मुखवाले पात्र में डाल दें और उसके मुख पर एक ऐसा ढकना रखें, जिसमें कनिष्ठिका अंगुली जाने योग्य छिद्र हो, फिर लोहे की कड़छुल में वंग अथवा सीसा को डालकर अग्नि द्वारा पिघला कर उक्त छिद्र में से धीर-धीरे द्रव में बुझायें। जिस किसी धातु की भस्म बनानी हो उसे उक्त विधि से अवश्य शुद्ध कर लेना चाहिये।

सुवर्ण भस्म की विधि स्वर्णाच्च द्विगुणं सूतमम्लेन सह मर्दयेत्। तद्गोलकसमं गन्धं निदध्यादधरोत्तरम्॥५॥