भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

174 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे

गोलकं च ततो रुन्ध्याच्छरावदृढसम्पुटे। त्रिंशद् वनोपलैर्दद्यात् पुतान्येवं चतुर्दश।।6।। निरुत्थं जायते भस्म गन्धो देयः पुनः पुनः। शुद्ध सुवर्ण से दुगुना पारद लेकर दोनों को नींबू का रस डालकर घोटना चाहिये, घुटते-घुटते जब गोला बन जाये तो इस गोले के समान भाग शुद्ध गन्धक को पीसकर आधी गन्धक एक सिकोरे में रख दें, फिर दूसरे सिकोरे में बिछाकर रख दें, तदनन्तर गोला रखकर ऊपर से अवशिष्ट गन्धक रख दें, फिर दूसरे सिकोरे से ढाँककर कपड़मिट्टी से सम्पुट बनाकर सुखा लें, तत्पश्चात् तीस उपलों की अग्नि में पुट दें। इस प्रकार चौदह पुटें देने से सुवर्ण की 'निरुत्थ भस्म' हो जाती है और गन्धक हर एक पुट में बार-बार डालनी चाहिये। वक्तव्य-1 तोला सुवर्ण के पत्रों को उक्त विधि से शुद्ध करके चावलों के से टुकड़ों में काट लिया जाता है। फिर जब उन्हें पारद में डालकर घोटा जाता है, तो पीठी-सी बन जाती है। इस पीठी का गोला नहीं, अपितु टिकिया बनानी चाहिये, जिससे गन्धक चूर्ण से भली प्रकार ढाँकी जा सके। और 'गन्धोदेयः पुनः पुनः' इस कथन के अनुसार बार-बार गन्धक ही नहीं पारद भी देना चाहिये तथा सुवर्ण तथा पारद की पिष्टि तैयार हो जाने पर गन्धक को भी उसके साथ पीस देना चाहिये। तीस उपलों या कण्डों की संख्या का निर्देश सम्भवतः 1 से 4 तोला तक सुवर्ण की भस्म बनाने के लिए है। एक बात स्मरण रखनी चाहिये कि चौदह पुटों के पश्चात् भी कभी-कभी सुवर्ण के कण चमकते हुये दिखलायी पड़ते हैं, ऐसी स्थिति में और भी पुटें देनी चाहिये। इस विधि से बनी हुई 'सुवर्णभस्म' बादामी रंग की या धूसर वर्ण की होती है। निरुत्थभस्म - भस्मीभूत धातु फिर किसी प्रकार भी जीवित न हो, अर्थात् अपने रूप को धारण न कर सके, किन्तु देखा गया है कि उक्त विधि से बनी हुई सुवर्ण भस्म को सुहागा तथा नौसादर के संयोग से तपाने पर पुनरपि सुवर्ण बन जाता है। अतः श्रीआढमल्ल ने कहा है-'निरुत्थता- ऽत्रात्यर्थं मूर्च्छना कथ्यते ननु स्वर्णस्य मृतिर्भवति' अर्थात् निरुत्थ शब्द का अर्थ है-अत्यन्त मूर्च्छित होना, स्वरूपतः सुवर्ण कहलाने योग्य न रह जाना। क्योंकि सुवर्ण की मृत्यु (सदेव के लिए स्वरूप का परित्याग) नहीं होती। यह कथन विश्वसनीय है। कुछ लोगों का कथन है कि 'सुवर्ण एवं चाँदी के बरक या तबक का प्रयोग भारतीय नहीं है, वे ध्यान दें- महर्षि सुश्रुत ने बालक को सुवर्ण चूर्ण चटाने की आज्ञा दी है। यथा-'सौवर्णं सुकृतं चूर्णं कुष्ठं मधु घृतं वचा।' देखें-सु० शा० अ० 10। और-'अपक्वं हेमसङ्घृष्टं शिलायां जलयोगातः। द्रवरूपं तु तत्पेयं मधुना गुणदायकम्।। यद्यपि तवकारव्यं तु स्वर्णपत्रविचूर्णितम्। मधुना सङ्गृहीतं चेत् सद्यो हन्ति विषादिकम्।। देखें-आ० प्र० अ० 3। अर्थात् सुवर्ण को जलयोग से घिसकर मधु के साथ चाटना चाहिये। इसके सेवन करने से विष आदि के विकार नष्ट हो जाते हैं।

सुवर्ण भस्म की दूसरी विधि काञ्चने गालिते नागं षोडशांशेन निक्षिपेत्।।7।। चूर्णयित्वा तथाम्लेन घृष्ट्वा कृत्वा च गोलकम्। गोलकेन समं गन्धं दत्त्वा चैवाधरोत्तरम्।।8।। शरावसम्पुटे धृत्वा पुटेत् त्रिंशद्वनोपलैः। एवं सप्तपुटैर्हेम निरुत्थं भस्म जायते।।9।। सुवर्ण को गलाकर उसमें सोलहवाँ भाग शुद्ध सीसा डाल दें। जब दोनों पिघलकर मिल जाये तो अग्नि पर से उतार कर शीतल हो जाने पर फिर इसका चूर्ण बनाकर नींबू के रस के साथ तब तक घोटें, जब तक कि काला पानी निकलता रहे, तत्पश्चात् गोला या टिकिया बना लें। अब उक्त गोलक के समान भाग गन्धक का चूर्ण सिकोरे में गोलक के नीचे तथा ऊपर रखकर और दूसरे सिकोरे से ढाँककर तथा कपड़मिट्टी से सम्पुट बना लें और सूख जाने पर तीस वनोपलों (वनकण्डों) में रखकर पुट दें। इस प्रकार सात पुटें देने से सुवर्ग की निरुत्थभस्म बन जाती है। वक्तव्य-सोना 4 तोला, सीसा 4 आना भर तथा गन्धक 11 तोला लेना चाहिये।

तीसरी विधि काञ्चनाररसैर्घृष्ट्वा समसूतकगन्धयोः। कज्जल्या हेमपत्राणि लेपयेत् सममात्रया।।10।। काञ्चनारत्वचः कल्कैर्मूषायुग्मं प्रकल्पयेत्। धृत्वा तत्सम्पुटे गोलं मृन्मूषासम्पुटे पचेत्।।11।। निधाय सन्धिरोधं च कृत्वा संशोष्य कोकिलैः। वह्निं खरतरं कुर्यादेवं दद्यात् पुटत्रयम्।।12।। निरुत्थं जायते भस्म सर्वकार्येषु योजयेत्। समान भाग पारद-गन्धक की कज्जली बनाकर कचनार की छाल के रस अथवा क्वाथ के साथ घोंटे। जब लेई-सी हों