शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें176 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे एक भाग (4 तोला) हरिताल को आसी भी अम्लद्रव (नींबू आदि के रस) के साथ एक प्रहर-पर्यन्त पीसना चाहिये, तत्पश्चात् जब लेई-सी हो जाये तो तीन भाग (12 तोला) तार अर्थात् चाँदी के पत्तों पर उसका लेप करना चाहिये। फिर इन पत्रों को दो सिकोरों के सम्पुट में रखकर तीस वनोपलों की अग्नि में पुट देना चाहिये। सर्वथा शीतल हो जाने पर इसे संपुट से निकालकर और एक भाग शुद्ध हरिताल डालकर किसी खटाई से पीटकर तथा सम्पुट में बन्द कर पुट दें। इसी प्रकार क्रमशः चौदह पुटें देने से चाँदी की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से चाँदी की भस्म आसमानी रंग की बनती है। इसमें से हरिताल उड़ जाता है, अतः चाँदी भस्म की तौल भी नहीं बढ़ती है। रजत भस्म की दूसरी विधि स्नुहीक्षीरेण सम्पिष्टं माक्षिकं तेन लेपयेत् ।। 23 ।। तालकस्य प्रकारेण तारपत्राणि बुद्धिमान्। पुटेच्चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।। 24 ।। चार तोला स्वर्णमाक्षिक (सोनामाखी) को सेहुण्ड (थूहर) के दूध के साथ पीसकर उपर्युक्त हरिताल की विधि से बारह तोला शुद्ध चाँदी के पत्रों पर लेप करें और पुट दें। इसी प्रकार चौदह पुटें देने से चाँदी की भस्म हो जाती है। वक्तव्य-उक्त विधि से बनायी गयी भस्म में स्वर्णमाक्षिक की भस्म भी मिली रहती है, अतः उसकी तौल बढ़ जाती है। चाँदी भस्म के गुण-'रूप्यं शीतकषायाम्लं स्वादु पाकरसं सरम्। वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित्' ।। अर्थात् चाँदी शीतल, कषाय एवं अम्ल है; पाक में स्वादु है, सर (विसरणशील) है, आयु को स्थायी रखने वाली है, स्निग्ध है, लेखन है एवं वात, पित्त को जीतती है। खानों में उक्त धातु ताम्र एवं सीसक के साथ मिला हुआ पाया जाता है और कहीं-कहीं पृथक् भी पाया जाता है। इसका गुरुत्व 10. 4 है तथा द्रवणांक 960° से० है। आर भस्म की विधि अर्कक्षीरेण सम्पिष्टो गन्धकस्तेन लेपयेत्। समेनारस्य पत्राणि शुद्धान्यम्लद्रवैर्मुहुः ।। 25 ।। ततो मूषापुटे धृत्वा पुटेद् गजपुटेन च। एवं पुटद्वयेनैव भस्मारं भवति ध्रुवम् ।। 26 ।। आरवत् कांस्यमप्येवं भस्मतां याति निश्चितम् । आक के दूध के साथ गन्धक (10 तोला) को पीस लें और अम्लद्रव (काञ्जी आदि) में 3 अथवा 7 बार शुद्ध किये हुये पीतल के पत्रों पर उस (गन्धक) का लेप करें, तत्पश्चात् सम्पुट में रखकर गजपुट द्वारा पुट दें। इस प्रकार दो पुटें देने से आर (पीतल) की भस्म हो जाती है। आर की विधि से कांस्य (काँसा) की भी भस्म बनती है। वक्तव्य-उक्त विधि से पीतल की भस्म बनाने का यत्न किया गया, किन्तु पीतल पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा अर्थात् सर्वथा कच्चा रह गया, भस्म नहीं बनी। फिर हरताल के योग से भस्म बन गयी, किन्तु उक्त विधि से कांस्य की भस्म बन गई। पीतल और काँसा दोनों ही प्रसिद्ध एवं मिश्रित पदार्थ हैं। यथा-'अष्टभागेन ताम्रेण द्विभागं कुटिलं मतम् । एकत्र द्रावितं तत् स्यात् कांस्यं सौराष्ट्रजं शुभम् ।। (आ० प्र० अ० 4)।' अर्थात् आठ भाग तांबा तथा दो भाग वंग (रांगा) को एक साथ पिघलाने से 'कांस्य' नामक द्रव्य तैयार हो जाता है और 'रीतिरप्युपधातुः स्यात् ताम्रस्य यशदस्य च।' (आ०प्र० अ० 4)। अर्थात् 12 भाग तांबा, एक भाग यशद (जस्ता) दोनों को एक साथ पिघलाने से पीतल तैयार हो जाता है। इनके गुण भी इनकी उपादान धातुओं के समान ही होते हैं। पीतल का गुरुत्व 8.05 है। पीतल एवं कांस्य के साथ 'भर्त्त' नामक पदार्थ को जानना भी आवश्यक है। उसकी भस्म भी बनायी जाती है। यथा-'कांस्यं रीतिस्तथा ताम्रं नागो वङ्गश्च पञ्चमः। एकत्र द्रावितैरेतैः पञ्चलोहं प्रजायते ।। पञ्चलोहे पञ्चरसं वर्तुलं भर्त्तमित्यपि । व्यञ्जनं सूपमन्यच्च तद्भाण्डे साधितं शुभम् ।। (आ० प्र० अ० 4.78-79) अर्थात्-कांसा, पीतल, तांबा, सीसा एवं रांगा को एक साथ पिघलाने से पञ्चलोह बनता है। उसके नाम ये हैं-पञ्चरस, वर्तुल एवं भर्त्त। इसके पात्र में शाक एवं दालें उत्तम तैयार होती हैं। यद्यपि वर्तमान शार्ङ्गधरसंहिता में यशद धातु का कोई भी उल्लेख नहीं है, तथापि हमारा विश्वास है कि आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी मूल पुस्तक में उसका अवश्य उल्लेख किया होगा। अतएव हमने यहाँ उसका उल्लेख कर दिया है। यथा-'यशदं रङ्गसङ्काशं रीतिहेतुश्च तन्मतम् । यशदं गिरिजं तस्य दोषाः शोधनमारणे ।। वङ्गस्येव हि बोद्धव्या गुणांस्तु प्रवदाम्यहम्। जशदं तुवरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासं च नाशयेत् ।।' (आ० प्र०अ० 3) अर्थात्-जस्ता रांगा जैसा होता है और वह पीतल का हेतु (कारण) है। यशद पर्वतों की खानों में उत्पन्न होता है। उसके दोष, शोधन एवं मारण (भस्मीकरण) वंग के ही CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA