भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 231, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 231

द्वादशोऽध्यायः] रसादिशोधनमारणकल्पना 195

स्वस्थचित्त तथा पवित्र होकर लोकनाथ रस के समान ही पथ्यादि का सेवन करें। यह 'मृगाङ्करस' कफरोग, ग्रहणीरोग, कास, श्वास, क्षय, अरुचि, कृशता तथा दुर्बलता को नष्ट करता है।

हेमगर्भपोट्टली रस सूतात् पादप्रमाणेन हेम्नः पिष्टीं प्रकल्पयेत्। तयोः स्याद् द्विगुणो गन्धो मर्दयेत्काञ्जनारिणा ॥ ९७ ॥ कृत्वा गोलं क्षिपेन्मूषासम्पुटे मुद्रयेत् ततः। पचेद् भूधरयन्त्रेण वासरत्रितयं बुधः ॥ ९८ ॥ तत उद्धृत्य तत्सर्वं दद्याद् गन्धं च तत्समम्। मर्दयेदार्द्रकरसैश्चित्रकस्वरसेन च ॥ ९९ ॥ स्थूलपीतवराटांश्च पूरयेत् तेन युक्तितः। एतस्मादौषधात् कुर्यादष्टमांशेन टङ्कणम् ॥ १०० ॥ टङ्कणार्धं विषं दत्त्वा पिष्ट्वा सेहुण्डदुग्धकैः। मुद्रयेत् तेन कल्केन वराटानां मुखानि च ॥ १०१ ॥ भाण्डे चूर्णप्रलिप्ते च धृत्वा मुद्रां प्रदापयेत्। गर्ते हस्तोन्मिते धृत्वा पुटेद् गजपुटेन च ॥ १०२ ॥ स्वाङ्गशीतं रसं ज्ञात्वा प्रदद्याल्लोकनाथवत्। पथ्यं मृगाङ्कवज्ज्ञेयं त्रिदिनं लवणं त्यजेत् ॥ १०३ ॥ यदा छर्दिर्भवेत् तस्य दद्याच्छिन्नोद्भवाशृतं तदा। मधुयुक्तं तथा श्लेष्मकोपे दद्याद् गुडार्द्रकम् ॥ १०४ ॥ विरेके भर्जिता भङ्गा प्रदेया दधिसंयुता। जयेत् कासं क्षयं श्वासं ग्रहणीमरुचिं तथा ॥ १०५ ॥ अग्निं च कुरुते दीप्तं कफवातं नियच्छति। हेमगर्भः परो ज्ञेयो रसः पोट्टलिकाभिधः ॥ १०६ ॥

पारद (4 तोला) से चतुर्थांश सुवर्ण (1 तोला) लेकर दोनों की पीठी बनायें, फिर दोनों से दुगुनी (10 तोला) शुद्ध गन्धक मिलाकर कचनार की छाल के क्वाथ से मर्दन करें। उसके बाद गोला बनाकर मूषासम्पुट में रखकर कपड़मिट्टी से सन्धिरोध कर दें। तत्पश्चात् भूधरयन्त्र द्वारा तीन दिन-पर्यन्त इस सम्पुट का पाक करके निकालकर सब द्रव्यों के समान भाग में शुद्ध गन्धक मिला दें और आर्द्रक (अदरख) तथा चित्रक के स्वरस से मर्दन करें। फिर इस औषधि को मोटी तथा पीली कौड़ियों में भर दें। इस औषध से अष्टमांश टंकण (सोहागा) और टंकण से आधा विष (मीठा तेलिया) लेकर दोनों को थूहर के दूध से पीसे और जब कल्क-सा हो जाये तब इस कल्क से कौड़ियों के मुख बन्द करके इन कौड़ियों को चूना से लिपे हुये पात्र में रखकर उसका मुख बन्द कर

एक हाथ गहरे गड्ढे में रखकर पुट दें और स्वांगशीतल हो जाने पर निकाल लें। लोकनाथ रस की भाँति इसका भी प्रयोग करें। पथ्य लोकनाथ रस के समान देना चाहिये और तीन दिन पर्यन्त लवण का परित्याग कर दें। यदि रोगी को छर्दि या कै हो तो इसका प्रयोग गिलोय के रस के साथ करना चाहिये। कफरोगों में मधु और अदरक के रस के साथ देना चाहिये। अतिसार में भुनी हुई भाँग दही में मिलाकर देनी चाहिये। यह रस कास, श्वास, ग्रहणीरोग तथा अरुचि को जीतता है, जठराग्नि को दीप्त करता है तथा कफवात के विकारों को रोकता है। यह 'हेमगर्भपोट्टली' नामक रस बहुत उत्तम औषध है।

वक्तव्य-भूधरयन्त्र की विधि यह है-पृथ्वी में गड्ढा खोद लिया जाता है और उसमें औषधि का सम्पुट रखकर ऊपर थोड़ा बालू बिछा देते हैं और उपलों का पुट दे देते हैं। यथा-'बालुकागूढसर्वाङ्गां गर्त्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं तद् भूधराभिधम्' ॥

दूसरा हेमगर्भपोट्टली रस रसस्य भागाश्चत्वारस्तावन्तः कनकस्य च। तयोश्च पिष्टिकां कृत्वा गन्धो द्वादशभागिकः ॥ १०७ ॥ कुर्यात् कज्जलिकां तेषां मुक्ताभागाश्च षोडश। चतुर्विंशच्च शङ्खस्य भागैकं टङ्कणस्य च ॥ १०८ ॥ एकत्र मर्दयेत् सर्वं पक्वनिम्बूकजै रसैः। कृत्वा तेषां ततो गोलं मूषासम्पुटके न्यसेत् ॥ १०९ ॥ मुद्रां दत्त्वा ततो हस्तमात्रे गर्ते च गोमयैः। पुटेद् गजपुटनैव स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत् ॥ ११० ॥ पिष्ट्वा गुञ्जाचतुर्मानं दद्याद् गव्याज्यसंयुतम्। एकोनत्रिंशदुन्मानमरिचैः सह दीयते ॥ १११ ॥ राजते मृन्मये पात्रे काचजे वाऽवलेहयेत्। लोकनाथसमं पथ्यं कुर्याच्च स्वस्थमानसः ॥ ११२ ॥ कासे श्वासे क्षये वाते कफे ग्रहणि कागदे। अतीसारे प्रयोक्तव्या पोट्टली हेमगर्भिका ॥ ११३ ॥

पारद चार भाग (4 तोला) और सुवर्ण चार भाग (4 तोला) दोनों को खरल में डालकर मर्दन करें और पीठी बना लें, फिर इसमें बारह भाग (12 तोला) शुद्ध गन्धक डालकर कज्जली बना लें। मोतीभस्म 16 भाग (16 तोला), शंखभस्म 24 भाग (24 तोला) और टंकण भस्म 1 भाग (1 तोला) इन सबको एक साथ मिलाकर नींबू के रस से मर्दन करे। तत्पश्चात् गोला बनाकर मूषासम्पुट में भरकर कपड़मिट्टी द्वारा

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA