शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें204 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे विद्याधर रस गन्धकं तालकं ताप्यं मृत्तताम्रं मनःशिलाम्। शुद्धं सूतं च तुल्यांशं मर्दयेद् भावयेद् दिनम्।।213।। पिप्पल्यास्तु कषायेण वज्रीक्षीरेण भावयेत्। निष्कार्धं भक्षयेत् क्षौद्रैर्गुल्मं प्लीहादिकं जयेत्।।214।। रसो विद्याधरो नाम गोमूत्रं च पिबेदनु। शुद्ध गन्धक, शुद्ध हरिताल, शुद्ध स्वर्णमाक्षिक, ताम्रभस्म, शुद्ध मैनसिल तथा शुद्ध पारद को समान भाग में लेकर भली-भाँति पीसना चाहिये और एक दिन तक पीपल के क्वाथ का और एक दिन तक सेहुण्ड के दूध की भावना देनी चाहिये। तत्पश्चात् आधा निष्क (दो आना भर) की मात्रा मधु के साथ खानी चाहिये। यह गुल्म तथा प्लीहा आदि को जीतता है। इसका नाम 'विद्याधर रस' है। इसके अनुपान में गोमूत्र पीना चाहिये। त्रिनेत्र रस टङ्कणं हारिणं शृङ्गं स्वर्णं शुल्बं मृतं रसम्।।215।। दिनैकमार्द्रकद्रावैर्मर्द्यं रुद्ध्वा पुटे पचेत्। त्रिनेत्राख्यरसस्यैकं माषं मध्वाज्यकैर्लिहेत्।।216।। सैन्धवं जीरकं हिङ्गु मध्वाज्याभ्यां लिहेदनु। पक्तिशूलहरः ख्यातो मासमात्रान्न संशयः।।217।। शुद्ध टंकण (आग में भुना हुआ), हरिण के सींग की भस्म, सुवर्णभस्म, ताम्रभस्म तथा पारद भस्म (रससिन्दूर) सभी द्रव्यों को समान भाग में लेकर अदरक के रस से एक दिन तक मर्दन करना चाहिये, तत्पश्चात् सम्पुट में रखकर पुट देनी चाहिये। इसका नाम 'त्रिनेत्र रस' है। इसकी एक माशा की मात्रा मधु तथा घृत के साथ चाटनी चाहिये और अनुपान में सेंधा नमक, भुना हुआ सफेद जीरा एवं घी में भुनी हुई हींग का चूर्ण मधु तथा घृत के साथ चाटना चाहिये। यह रस पक्तिशूल (परिणाम) को एक मास में नष्ट कर देता है, इसमें सन्देह नहीं है। गजकेसरी रस. शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं यामैकं मर्दयेद् दृढम्। द्वयोस्तुल्यं शुद्धताम्रं सम्पुटे तन्निरोधयेत्।।218।। ऊर्ध्वाधो लवणं दत्त्वा मृद्भाण्डे धारयेद् भिषक्। ततो गजपुटे पक्त्वा स्वाङ्गशीतं समुद्धरेत्।।219।। सम्पुटं चूर्णयेत् सूक्ष्मं पर्णखण्डे द्विगुञ्जकम्। भक्षयेत् सर्वशूलार्तो हिङ्गु शुण्ठी च जीरकम्।।220।। वचामरिचजं चूर्ण कर्षमुष्णाजलैः पिबेत्। असाध्यं नाशयेच्छूलं रसोऽयं गजकेसरी।।221।। शुद्ध पारद एक भाग और शुद्ध गन्धक दो भाग दोनों का एक साथ एक पहर तक भली-भाँति मर्दन करना चाहिये। तत्पश्चात् दोनों के समान भाग शुद्ध ताम्र चूर्ण (यह अत्यन्त सूक्ष्म होना चाहिये) लेकर सम्पुट में बन्द कर दें। फिर मिट्टी के पात्र में ऊपर और नीचे लवण का चूर्ण देकर इस सम्पुट को टिकाकर रख दें। तत्पश्चात् गजपुट में पकाकर सर्वांगशीतल होने पर निकाल लें। सम्पुट में से औषध (ताम्रभस्म) निकालकर अत्यन्त सूक्ष्म पीस लें और सभी प्रकार के शूल से पीड़ित रोगी इस औषध को दो रत्ती लेकर पान के पत्र में रखकर खायें। घी में भुनी हुई हींग, सोंठ, भुना हुआ सफेद जीरा, वच और मरिच का चूर्ण एक तोला लेकर उष्ण जल के साथ इसे पीयें। यह 'गजकेसरी रस' असाध्य शूल को नष्ट करता है। अग्नितुण्डवटी रस शुद्ध सूतं विषं गन्धमजमोदां फलत्रयम्। स्वर्जिक्षारं यवक्षारं वह्निसैन्धवजीरकम्।।222।। सौवर्चलं विडङ्गानि सामुद्रं त्र्यूषणं समम्। विषमुष्टिं सर्वतुल्यां जम्बीराम्लेन मर्दयेत्।।223।। मरिचाभां वटीं खादेद् वह्निमान्द्यप्रशान्तये। (पथ्या शुण्ठी गुडं चानु पलार्धं भक्षयेत् सदा। अग्नितुण्डवटीख्याता सर्वरोगकुलान्तका।।224।।) शुद्ध पारद, शुद्ध विष, शुद्ध गन्धक, अजमोदा, त्रिफला, सज्जीखार, जौखार, चीता की जड़, सेंधा नमक, सफेद जीरा, काला नमक, वायविडंग, समुद्र नमक एवं त्रिकटु इन सबको समान भाग में लेकर सबके समान भाग में शुद्ध कुचिला लें और सबको जम्बीरी नींबू के रस में मर्दन करें तथा मरिच जैसी गोलियाँ बनाकर अग्निमान्द्य की शान्ति के लिए खाना चाहिये। अनुपान के रूप में हरड़, सोंठ, गुड़ सब मिलाकर आधा पल लें। यह 'अग्नितुण्डवटी' सभी रोगों का विनाश करती है। अजीर्णकण्टक रस शुद्धं सूतं विषं गन्धं समं सर्वं विचूर्णयेत्।।225।। मरिचं सर्वतुल्यांशं कण्टकार्याः फलद्रवैः। मर्दयेद् भावयेत् सर्वमेकविंशतिवारकम्।।226।। वटीं गुञ्जात्रयं खादेत् सर्वाजीर्णप्रशान्तये। अजीर्णकण्टकासोऽयं रसो हन्ति विषूचिकाम्।।227।।