भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

द्वितीयोऽध्यायः ] स्वेदविधिः 219 द्रव्यों को दूध, मांलरस अथवा अम्ल द्रव (काँजी आदि) के साथ पीसकर नमक तथा स्नेह (तिलतैल आदि) मिलाकर गर्म करें और वातपीड़ित शरीर के अवयव को वातहरलेप से लीपकर (मोटा लेप लगाकर) उपनाह नामक स्वेद का प्रयोग करें। अथवा गाँव में रहने वाले (घोड़ा, खच्चर, गदहा, मेढ़ा तथा दुम्बा आदि) अनूप देश में रहने वाले (हाथी, भैंस तथा सूअर आदि) प्राणियों के मांस अथवा जीवनीयोगण (देखें- शा०, म०खं० अ० 6) के द्रव्य अथवा दही, काँजी तथा दूध में पीसे हुये वीरतर्वादिकण (देखें-शा०, म०खं० अ० 2) के द्रव्य लेकर और पीसकर प्रदेह (पुलटिश) करें, अथवा कुलथी, उड़द, गेहूँ, तीसी (अलसी), तिल, सरसों (या राई), सौंफ, देवदारु, सम्भालू, कलौंजी (मंगरेला), एरण्ड की जड़ तथा बीज, रासना, मूली के बीज, सहजन के बीज या पत्ते, सोया, पीपल, तुलसी, नमक (कोई भी), अम्ल (कोई भी), गन्ध-प्रसारिणी, असगन्ध, बला (चारों प्रकार की), दशमूल (देखें-शा०, म०खं० अ० 2), गिलोय तथा किवाँच के बीज- इसमें से जितने द्रव्य मिल जायें, उन्हें लेकर, कूटकर, पकाकर तथा कपड़ें में बाँधकर स्वेदन कराये। यह 'महाशाल्वण' नामक योग सभी प्रकार की वातव्याधियों को नष्ट करता है। वक्तव्य-प्रदेह को 'पुलटिस' कहा जाता है और स्वेदन द्रव्यों की पोटली बनाकर स्वेदन या सेक कराना भी प्रदेह के ही अन्तर्गत आता है। द्रवस्वेद-विधि द्रवस्वेदस्तु वातघ्नो द्रव्यक्वाथेन पूरिते। कटाहे कोष्ठके वाऽपि सूपविष्टोऽवगाहयेत्।। 29।। द्रवस्वेद की विधि-वात नाशक द्रव्यों के क्वाथ से भरे हुये कटाह (कड़ाहा) अथवा कोष्ठक (द्रोणी या टब) में बैठकर अवगाहन करना चाहिये। वक्तव्य-उक्त विधि से दूध, मांलरस, यूष, तैल, धान्याम्ल, घृत, वसा तथा मूत्र में भी अवगाहन किया जाता है। उषा द्रवा से सेचन करना भी द्रवस्वेद ही है। द्रवद्रव्य का परिमाण नाभेः षडङ्गुलं यावन्मग्नः क्वाथस्य धारया। कोष्णाया स्कन्धयोः सिक्तस्तिष्ठेत् स्निग्धतनुर्नरः ।।30 ।। एवं तैलेन दुग्धेन सर्पिषा स्वेदयेन्नरम्। स्वेदन के पूर्व रोगी को स्नेहपान अथवा अभ्यंग द्वारा स्निग्ध करके तत्पश्चात् कटाह अथवा कोष्ठक या नाँद में बैठा दें, इस (कटाह) में वातनाशक द्रव्यों का क्वाथ इतना भरना चाहिये जिससे नाभि से छः अंगुल तक डूब जाये, और उक्त क्वाथ की धारा रोगी के कन्धों तक भी स्पर्श कर सके। इस प्रकार रोगी को तैल, दूध अथवा घृत से भी स्वेदन कराया जा सकता है। वक्तव्य-शीतकाल में उष्ण जल से स्नान करना अथवा उष्ण जल से भरे हुये टब (नाँद) में बैठकर स्नान कराना 'द्रवस्वेद' ही है। स्नेहकृत स्वेद का काल एकान्तरे द्वयन्तरे वा स्नेहो युक्तोऽवगाहने । अवगाहन में तैल आदि स्नेहों का प्रयोग एक अथवा दो दिन का अन्तर देकर करना चाहिये। स्वेद का लाभ-प्रकार शिरामुखैर्लोमकूपैर्धमनीभिश्च तर्पयेत् ।। 31 ।। शरीरे बलमाधत्ते युक्तः स्नेहोऽवगाहने । अवगाहन में स्नेह का प्रयोग करने से वह सिराओं के मुखों द्वारा रोमकूपों तथा धमनियों से भीतर जाकर शरीर को तृप्त करता है और बल को बढ़ाता है। स्वेद से धातुवृद्धि जलसिक्तस्य वर्धन्ते यथा मूलेऽङ्कुरास्तरोः ।। 32 ।। तथा धातुविवृद्धिर्हि स्नेहसिक्तस्य जायते । नातः परतरः कश्चिदुपायो वातनाशनः ।। 33 ।। जैसे जड़ में जल सींचने से वृक्ष के अंकुर बढ़ते हैं ठीक वैसे ही स्नेह द्वारा सींचने से शरीर में धातुओं का वृद्धि होती है। स्नेहावगाहन से उत्तम वातनाशन का कोई भी उपाय नहीं है। स्वेदन की अवधि शीतशूलाद्युपरमे स्तम्भगौरवनिग्रहे। दीप्ताग्नौ मार्दवे जाते स्वेदनाद् विरतिर्मता ।। 34।। शीत तथा शूल के शान्त हो जाने पर, स्तम्भ (जकड़न), तथा भारीपन के नष्ट हो जाने पर, जठराग्नि दीप्त हो जाने पर और शरीर में मृदुता या कोमलता उत्पन्न हो जाने पर स्वेदन कार्य बन्द कर देना चाहिये। सुस्विन्न का आहार-विहार सम्यक्स्विन्नं विमृदितं स्नानमुष्णाम्बुभिः शनैः। भोजयेच्चानभिष्यन्दि व्यायामं च न कारयेत्।। 35 ।।