भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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222 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे वमन के अयोग्यों को भी वमन का विधान एतेऽप्यजीर्णव्यथिता वाम्या ये विषपीडिताः। कफव्याप्ताश्च ते वाम्या मधुकक्वाथपानतः॥10॥ ये भी, जिन्हें वमन नहीं कराना चाहिये, यदि वे अजीर्ण से अथवा विष-विकार से पीड़ित हों तो वमन कराने योग्य माने जाते हैं। यदि वे कफ-विकार से व्याप्त हों तो उनको मुलेठी का क्वाथ पिलाकर वमन करानी चाहिये। सुकुमार आदि के वमन की विधि सुकुमारं कृशं बालं वृद्धं भीरुं च वामयेत्। पीत्वा यवागूमाकण्ठं क्षीरतक्रदधीनि वा॥11॥ सुकुमार, कृश, बालक, वृद्ध तथा भीरु (डरपोक) को यवागू, दूध, मट्ठा अथवा दही कंठ तक पिलाकर वमन कराना चाहिये। वमन का विशेष विधान असात्म्यैः श्लेष्मलैर्भोज्यैर्दोषानुत्क्लिश्य देहिनः। स्निग्धस्विन्नाय वमनं दत्तं सम्यक् प्रवर्तते॥12॥ स्निग्ध तथा स्विन्न अर्थात् जिनको स्नेहन, स्वेदन कराया जा चुका हो उनके दोषों को, असात्म्य तथा कफवर्धक भोजनों (भक्ष्य, पेय आदि) से उभाड़ दिया हुआ वमन भली-भाँति प्रवृत्त होता है। वमन के सहायक द्रव्य वमनेषु च सर्वेषु सैन्धवं मधु वा हितम्। सभी वमन की औषधियों में सेंधा नमक तथा मधु का प्रयोग लाभदायक होता है। वमन-विरेचन-स्वरूप बीभत्सं वमनं दद्याद् विपरीतं विरेचनम्॥13॥ बीभत्स (अरुचिकर) द्रव्यों से वमन तथा इससे विपरीत (रुचिकर) द्रव्यों से विरेचन देना चाहिये। वमन-द्रव्यों का परिमाण क्वाथ्यद्रव्यस्य कुडवं श्रपयित्वा जलाढके। अर्धभागावशिष्टं च वमनेष्ववचारयेत्॥14॥ क्वाथ्य द्रव्य एक कुडव (14 तोला) लेकर एक आढक (3 सेर 16 तोला) जल में पकायें आधा जल शेष रह जानें पर इसका वमन के लिए प्रयोग करें। क्वाथ-पान की मात्रा क्वाथपाने नवप्रस्था ज्येष्ठा मात्रा प्रकीर्तिता। मध्यमा षण्मिता प्रोक्ता त्रिप्रस्था च कनीयसी॥15॥ क्वाथ की उत्तम मात्रा नौ प्रस्थ की, मध्यम मात्रा छः प्रस्थ की तथा कनीयसी (छोटी) मात्रा तीन प्रस्थ की कही गयी है। कल्कादि की मात्रा कल्कचूर्णावलेहानां त्रिपलं श्रेष्ठमात्रा। मध्यमां द्विपलां विद्यात् कनीया पलसम्मिता॥16॥ कल्क, चूर्ण तथा अवलेहका उत्तम मात्रा, तीन पल (12 तोला) की, मध्यम मात्रा दो पल की तथा कनीयसी मात्रा एक पल की माननी चाहिये। वक्तव्य—यहाँ उक्त मात्राओं का उल्लेख सामान्य रूप से किया गया है। इनका प्रयोग देश, काल, वध तथा बल के अनुसार करना चाहिये। वमन के वेग वमने चापि वेगाः स्युरष्टौ पित्तान्तमुत्तमाः। षड्‌वेगा मध्यमा वेगाश्चत्वारस्त्ववरे स्मृताः॥17॥ वमन के आठ वेग होते हैं। यदि अन्तिम वेग में पित्त निकल जाये तो उत्तम माना जाता है। छः वेग मध्यम तथा चार वेग स्वर (हीन) माने जाते हैं। वमनादि में प्रस्थ का मान वमने च विरेके च तथा शोणितमोक्षणे। सार्धत्रयोदशपलं प्रस्थमाहुर्मनीषिणः॥18॥ वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण में विद्वान् चिकित्सक साढ़े तेरह पल (54 तोला) का प्रस्थ मानते हैं। वक्तव्य—वमन, विरेचन तथा रक्तमोक्षण में कुछ दोष भले ही अवशिष्ट रह जायें, किन्तु इस अतियोग नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे शमन-क्रिया द्वारा शान्त किये जा सकते हैं। प्रकरण में प्रस्थ को छोटा स्वीकार करने का कारण भी यही है। दोष-भेद से द्रव्य-भेद कफं कटुकतीक्ष्णोष्णैः पित्तं स्वादुहिमैर्जयेत्। सुस्वादुलवणाम्लोष्णैः संसृष्टं वायुना कफम्॥19॥ कफ को कड़वी, तीक्ष्ण तथा उष्ण औषधियों द्वारा, पित्त को स्वादु (मधुर) तथा शीत औषधियों द्वारा, वायु से सम्मिलित कफ को सुमधुर, लवण (नमकीन) अम्ल (खट्टी) तथा उष्ण औषधियों द्वारा जीतना चाहिये।