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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः वमनविधिः


वमन-विरेचन का काल शरत्काले वसन्ते व प्रावृट्काले च देहिनाम्। वमनं रेचनं चैव कारयेत् कुशलो भिषक्।।१।। कुशल चिकित्सक शरद् ऋतु (कार्तिक तथा अगहन) में, वसन्त ऋतु (फाल्गुन तथा चैत्र) में प्रावृट् ऋतु (आषाढ़ तथा सावन) में मनुष्यों को वमन तथा विरेचन कराना चाहिये। वक्तव्य-स्नेहन तथा स्वेदन के पश्चात् यदि आवश्यकता हो तो शोधन (वमन, विरेचन) का प्रयोग किया जाता है। उक्त ऋतुओं का समय समशीतोष्ण होता है, अतः वमन- विरेचन कराने में किसा प्रकार का व्यापत्ति का भय नहीं रहता।

वमन के योग्य पुरुष बलवन्तं कफव्याप्तं हल्लासार्तिनिपीडितम्। तथा वमनसात्म्यं च धीरचित्तं च वामयेत्।।२।। बलवान्, कफ से व्याप्त, हल्लास (जी मिचलाना) आदि लक्षणों से पीड़ित, वमन-सात्म्य (जिसको वमन अनुकूल पड़ता हो) तथा धीरचित्त (जो घबराने वाला न हो) ऐसे पुरुष को वमन कराना चाहिये।

वमन के योग्य रोग विषदोषे स्तन्यरोगे मन्देऽग्नौ श्लीपदेऽर्बुदे। हृद्रोगकुष्ठवीसर्पप्रमेहार्जीर्णभ्रमेषु च।।३।। विदारिकापचीकासश्वासपीनसवृद्धिषु । अपस्मारे ज्वरोन्मादे तथा रक्तातिसारिषु।।४।। नासाताल्वोष्ठपाकेषु कर्णस्त्रावे द्विजिव्हिके। गलशुण्ड्यामतीसारे पित्तश्लेष्मगदे तथा।।५।। मेदोगदेऽरुचौ चैव वमनं कारयेद् भिषक्। विषजनित विकारों, स्तन्यजनित रोगों (बालकों तथा धात्री में), मन्दाग्नि, श्लीपद (फील-पाँव), अर्बुदरोग, हृदयरोगों, कुष्ठ, वीसर्प, प्रमेह, अजीर्ण (अपच तथा अलसक आदि) भ्रम, विदारिका नामक व्याधि अपची (गण्डमाला भेद), कास, श्वास, पीनस, अण्डवृद्धि, अपस्मार, ज्वर, उन्माद, रक्तातिसार, नासापाक, तालुपाक, ओष्ठपाक कर्णस्राव, द्विजिव्हक रोग, गलशुण्डी, अतिसार, पित्तकफ के रोगों, मेदोवृद्धि तथा अरुचि वमन कराना चाहिये।

वमन के अयोग्य रोग (अवाम्यवमनाद् रोगाः कृच्छ्रतां यान्ति रोगिणः।।६।। असाध्यतां वा गच्छन्ति ततोऽवाम्यान्न वामयेत्।) वमन के अयोग्य रोगों में वमन कराने से रोगी के रोग कृच्छ्रसाध्य अथवा असाध्य हो जाते हैं, अतः अवाम्य रोगियों को वमन नहीं कराना चाहिये।

वमन के अयोग्य रोगी न वामनीयस्तिमिरी न गुल्मी नोदरी कृशः।।7।। नातिवृद्धो गर्भिणी च न स्थूलो न क्षुधातुरः। मदार्तो बालको रूक्षः क्षुधितश्च निरूहितः।।8।। उदावर्त्यूर्ध्वरक्ती च दुश्छर्दी केवलानिल। पाण्डुरोगी कृमिव्याप्तः पठनात् स्वरघातकः।।9।। तिमिर (धुन्ध) रोगी, गुल्मरोगी (वायुगोला से पीड़ित) उदररोगों से पीड़ित कृश अत्यन्त वृद्ध, गर्भवती, अत्यन्त स्थूल, उरः क्षत से पीड़ित, मद्यजनित रोगों से पीड़ित, बालक रूक्ष शरीर वाला, भूख से पीड़ित, जिसको निरूहणवस्ति दी गयी हो, उदावर्त्त का रोगी, जिसको मुख, नाक आदि ऊपरी मार्गों से रक्तपित्त जा रहा हो, जिसे वमन होने में अत्यन्त कष्ट होता हो, जिसे केवल वायु के रोग हों, पाण्डुरोगी जिसके उदर में क्रिमि हों तथा जिसका पढ़ने के कारण स्वर बैठ गया हो, ऐसे लोगों को वमन कराना उचित नहीं है।


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