शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 259, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयाऽध्यायः ] | वमनविधिः | 223 [ बायाँ स्तम्भ ] पित्त में वमन कृष्णा राठफलं सिन्धु कफे कोष्णजलैः पिबेत्। पटोलवासानिम्बैश्च पित्ते शीतजलं पिबेत्॥२०॥ पीपल, मैनफल तथा सेंधा नमक का चूर्ण कफ-विकार में कोसे पानी के साथ, पित्त में परवल की पत्ती, अडूसा की पत्ती तथा निम्ब के पत्रों के शीतकषाय के साथ पीना चाहिये। कफवातज रोगों में वमन सश्लेष्मवातपीडायां सक्षीरं मदनं पिबेत्। अजीर्णे कोष्णपानीयैः सिन्धु पीत्वा वमेत् सुधीः॥२१॥ कफयुक्त वातज रोगों में मैनफल का चूर्ण दूध के साथ और अजीर्ण में उष्ण जल के साथ सेंधा नमक (जल में पकाकर) पिलाकर वमन कराना चाहिये। वमन के उपद्रवों की चिकित्सा (गण्डूषधूमानाहारान् रूक्षान् भुक्त्वा तदुद्वमेत्। व्यायामः स्रुतिरस्त्रस्य शस्तं चात्र विरेचनम्॥२२॥ सक्षारलवणं तैलमभ्यङ्गार्थं च शस्यते।) भली-भाँति वमन न होने से उत्पन्न हुये उपद्रवों में रूक्ष गण्डूष (कुल्ले), धूम तथा आहारों का प्रयोग करें और भोजन करके तत्काल वमन करा दें। व्यायाम, रक्तस्राव (सिरावेध आदि द्वारा) तथा विरेचन भी इस दशा में प्रशस्त होता है और क्षार (टंकण आदि) तथा नमक मिश्रित तैल का अभ्यंग (मालिश) भी लाभदायक होता है। वमन करते समय कर्तव्य वमनं पाययित्वा च जानुमात्रासने स्थितम्॥२३॥ कण्ठमेरण्डनालेन स्पृशन्तं वामयेद् भिषक्। ललाटं वमतः पुंसः पार्श्वे द्वे च प्रधारयेत्॥२४॥ वमनकारक औषधि पिलाकर रोगी को जानु भर ऊँचे आसन (कुर्सी) पर बिठा दें। जब जी मिचलाने लगे तो एरण्ड की लकड़ी (अथवा अंगुली) से कण्ठ को स्पर्श करते हुये रोगी को वमन कराये और जिस समय वमन हो रहा हो, उस समय रोगी का मस्तक पकड़ लेना चाहिये तथा दोनों ओर की पसलियों को मसलते रहना चाहिये। वक्तव्य—उक्त श्लोक सु० चि० अ० ३३ के छठे सूत्र के अन्तिम भाग का पद्यानुवाद मात्र है। उक्त क्रिया से रोगी घबराता नहीं और वमन में सहायता मिलती है। अन्य कार्य परिचारक से करवाने चाहिये, किन्तु गले के भीतर अंगुली का स्पर्श रोगी स्वयं कर सकता है।
[ दायाँ स्तम्भ ] दुर्दान्त के लक्षण प्रसेको हृद्ग्रहः कोठः कण्डूर्दुश्छर्दिते भवेत्। यदि वमन भली-भाँति नहीं होता तो प्रत्येक (मुख से पानी जाना), हृद्ग्रह (हृदय का गति में रुकावट), कोठ (शीतपित्त) तथा कण्डू (खुजली) ये लक्षण या रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतिवान्त के लक्षण अतिवान्ते भवेत् तृष्णा हिक्कोद्गारौ विसंज्ञता॥२५॥ जिह्वानिःसर्पणं चाक्ष्णोर्व्यावृत्तिर्हनुसंहतिः। रक्तच्छर्दिःष्ठीवनं च कण्ठे पीडा च जायते॥२६॥ वमन के अतियोग (अधिक हो जाने) से निम्नलिखित विकार उत्पन्न हो जाते हैं। यथा—प्यास, हिचकी, उद्गार (डकारों का अधिकता), मूर्च्छा या मोह, जिह्वा-निःसरण (जीभ का बाहर निकल आना), नेत्रों का विकृत हो जाना, हनुस्तम्भ, रक्त की उलटी, अधिक थूक आना तथा कण्ठ में वेदना होना। वमन के उपद्रवों की चिकित्सा वमनस्यातियोगे तु मृदु कुर्याद् विरेचनम्। वमनान्तः प्रविष्टायां जिह्वायां कवलग्रहः॥२७॥ स्निग्धाम्ललवणैर्हृद्यैर्घृतक्षीररसैर्हितः। फलान्यम्लानि खादेयुस्तस्य चान्येऽग्रतो नराः॥२८॥ निःसृतां तु तिलद्राक्षाकल्कं लिप्त्वा प्रवेशयेत्। व्यावृत्तेऽक्षिण घृताभ्यक्ते पीडयेच्च शनैः शनैः॥२९॥ हनुमोक्षे स्मृतः स्वेदो नस्यं च श्लेष्मवातहृत्। रक्तपित्तविधानेन रक्तच्छर्दिमुपाचरेत्॥३०॥ धात्रीरसाञ्जनोशीरलाजाचन्दनवारिभिः। मन्थं कृत्वा पाययेच्च सघृतक्षौद्रशर्करम्॥३१॥ शाम्यन्त्यनेन तृष्णाद्याः पीडाश्छर्दिसमुद्भवाः। वमन के अतियोग में मृदुविरेचन (साधारण-सा दस्त) कराना लाभदायक है (इससे वमन रुक जाता है)। अधिक वमन होने के कारण यदि जीभ भीतर की ओर चली गयी हो तो हृदय को प्रिय लगने वाले स्निग्ध अम्ल (खट्टे) तथा नमकीन द्रव्यों के तथा घी, दूध तथा मांसरस के साथ कवलग्रह हितकारक होते हैं और यदि उस मनुष्य के सामने दूसरा मनुष्य खट्टे फल (नींबू आदि) खायें तो उसकी जीभ उचित स्थान पर आ जाती है। बाहर निकली हुई जीभ को तिल तथा मुनक्का के कल्क का प्रलेप करके भीतर प्रविष्ट करा देना