भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 260

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[शीर्षक / Header] 224 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

चाहिये। विकृत हुई आँखों को घी की मालिश करके धीरे-धीरे पीड़न या यथास्थान बैठा देना चाहिये। हनुमोक्ष (विवृतास्यत्व अथवा संवृतास्यत्व) में स्वेद-अथवा कफ-वातनाशक नस्य देना उचित है। रक्तपित्त की चिकित्सा से रक्त के वमन का उपचार करना चाहिये। आँवला, रसवत, खस, धान का लावा, रक्तचन्दन तथा नेत्रबाला का मन्थ बनाकर उसमें घी, मधु तथा मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिये। इससे तृष्णा तथा हिचकी आदि उपद्रव जो वमन के अतियोग के कारण उत्पन्न हो गये हों तो शान्त हो जाते हैं।

सम्यग् वात के लक्षण हृत्कण्ठशिरसां शुद्धिर्दीप्ताग्नित्वं च लाघवम्।। ३२।। कफपित्तविनाशश्च सम्यग् वान्तस्य लक्षणम्। हृदय, कण्ठ तथा शिर का शुद्ध होना, अग्नि का दीप्त होना, शरीर में हलकापन, कफ तथा पित्त के विकारों का विनाश ये लक्षण जिसका उत्तम रीति से वमन हो गया हो, उसमें देखे जाते हैं। वक्तव्य-जब तक उक्त लक्षण उत्पन्न न हों, तब तक वमन कराते जाना चाहिये।

वान्त का पथ्य ततोऽपराह्णे दीप्ताग्नि मुद्गषष्टिकशालिभिः।। ३३।। हृद्यैश्च जाङ्गलसैः कृत्वा यूषं च भोजयेत्। उचित रूप से वमन हो जाने पर दोपहर के बाद (तीसरे पहर) दीप्ताग्नि (जिसकी अग्नि दीप्त हो या उचित रूप से भूख लगी हो) में मूंग, साठी के चावल तथा शालिचावलों से बनाये हुये यूष, हृद्य (हृदय को शक्ति देने वाले), जांगल (जांगल देश में उत्पन्न) प्राणियों (हरिण आदि) के मांस रस के साथ खिलाना चाहिये।


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

वमन के लाभ तन्द्रा निद्राऽस्यदौर्गन्ध्यं कण्डूश्च ग्रहणी विषम्।। ३४।। सुवान्तस्य न पीडायै भवन्त्येते कदाचन। तन्द्रा, निद्रा, मुख की दुर्गन्ध, खुजली, ग्रहणी रोग तथा विषजनित विकार ये सब सुवान्त (जिसको भली-भाँति वमन हो चुका है) मनुष्य को कभी भी कष्टदायक नहीं होते, अर्थात् उचित प्रकार से वमन होने पर उक्त रोग शान्त हो जाते हैं।

वमन में परिहार्य अजीर्णं शीतपानीय व्यायामं मैथुनं तथा।। ३५।। स्नेहाभ्यङ्गं प्रकोपं च दिनैकं वर्जयेत् सुधीः। वमन के पश्चात् बुद्धिमान् रोगी को अजीर्णोत्पादक वस्तुओं, शीत जल, व्यायाम, मैथुन, स्नेह की मालिश तथा क्रोध का परित्याग करना चाहिये। वक्तव्य-वमन के विषय में विशेष जानकारी के लिए च० सू० अ० 15 तथा सु० चि० अ० 33 देखें।

वमन-विरेचन के पूर्व स्नेहन-स्वेदन (स्नेहस्वेदावकृत्वाऽग्रे यस्तु संशोधनं पिबेत्।। ३६।। दारुशुष्कमिवानामे देहस्तस्य विशीर्यते।) इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे वमनविधिः तृतीयोऽध्यायः।। ३।। जो पुरुष पहले स्नेहन तथा स्वेदन न करके वमन, विरेचन की औषधि का पान करता है, उसकी देह उस प्रकार विशीर्ण हो जाती है जैसे स्नेहन स्वेदन के बिना झुकाने पर सूखी लकड़ी।


[पाद-टिप्पणी / समाप्ति वचन]

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तीसरा अध्याय समाप्त।। ३।।

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