शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 261, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः विरेचनविधिः
[वाम स्तम्भ / Left Column]
विरेचन-योग्य रोगी स्निग्धस्विन्नस्य वान्तस्य दद्यात् सम्यग्विरेचनम्। अवान्तस्य त्वधःस्रस्तो ग्रहणीं छादयेत् कफः॥१॥ स्निग्ध, स्विन्न तथा वान्त (जिसको विधिपूर्वक स्नेहन, स्वेदन तथा वमन कराया जा चुका हो) मनुष्य को विधिपूर्वक विरेचन कराना चाहिये। वक्तव्य- स्नेहन, स्वेदन तथा वमन कराने के बाद ही विरेचन देना चाहिये। देखें-सु० चि० अ० ३३। क्योंकि स्नेहन, स्वेदन का सेवन न करके जो मनुष्य संशोधन औषध का सेवन करता है, उसका शरीर सूखी लकड़ी के समान टूट जाता है।
वमन-रहित विरेचन के दोष मन्दाग्निं गौरवं कुर्याज्जनयेद् वा प्रवाहिकाम्। अथवा पाचनैरामं बलासं च विपाचयेत्॥२॥ स्निग्धस्य स्नेहनैः कार्यं स्वेदैः स्विन्नस्य रेचनम्। जिसको वमन नहीं कराया गया है, उस मनुष्य का कफ नीचे (आमाशय से ग्रहणी में) जाकर ग्रहणी को ढँककर उसे विकृत कर देता है। अतएव मन्दाग्नि, गौरव (भारीपन) तथा प्रवाहिका को उत्पन्न कर देता है। इसलिये वमन कराकर ही विरेचन कराना उचित होता है। अथवा पाचन-क्रिया द्वारा आम तथा कफ को पकाना चाहिये और स्नेहों द्वारा स्निग्ध तथा स्वेदों द्वारा स्विन्न मनुष्य को विरेचन देना उचित होता है।
विरेचन का काल शरदृतौ वसन्ते च देयं शुद्धौ विरेचनम्॥३॥ अन्यदात्ययिके काले शोधनं शीलयेद् बुधः। शरद् ऋतु (कार्तिक-मार्गशिर) तथा वसन्त ऋतु (फाल्गुन चैत्र) में देह की शुद्धि के लिए विरेचन देना चाहिये।
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
उक्त ऋतुओं से अतिरिक्त समय में अत्यन्त आवश्यक होने पर शोधन (विरेचन) द्रव्यों का सेवन किया जा सकता है। पाठभेद-'अन्यदात्ययिके कार्ये स्वेदनं शीलयेद् बुधः।' पाठक इस पाठ की दीपिका तथा गूढार्थदीपिका टीकाओं को भी देखें, आप समझ जायेंगे कौन-सा पाठ अधिक उपादेय है।
संशोधन का फल दोषाः कदाचित् कुप्यन्ति जिता लङ्घनपाचनैः॥४॥ ये तु संशोधनैः शुद्धा न तेषां पुनरुद्भवः। लंघन तथा पाचनक्रिया द्वारा जीते (शान्त किये) हुये दोष कभी कुपित हो सकते हैं, किन्तु शोधन-क्रिया द्वारा जो शुद्ध कर दिये जाते हैं, उनकी फिर से उत्पत्ति नहीं होती।
विरेचन-योग्य रोग पित्ते विरेचनं युज्यादामोद्भूते गदे तथा॥५॥ उदरे च तथाध्माने कोष्ठशुद्ध्यै विशेषतः। पित्तजनित विकारों, आमजनित रोगों, उदर रोगों तथा आध्मान (अफरा) कोष्ठशुद्धि के लिये विशेष रूप से विरेचन का प्रयोग करना चाहिये।
विरेचन के अयोग्य रोगी बालवृद्धावतिस्निग्धः क्षतक्षीणो भयान्वितः॥६॥ श्रान्तस्तृषार्तः स्थूलश्च गर्भिणी च नवज्वरी। नवप्रसूता नारी च मन्दाग्निश्च मदात्ययी॥७॥ शल्यार्दितश्च रूक्षश्च न विरेच्या विजानता। विद्वान् चिकित्सक निम्नलिखित व्यक्तियों को विरेचन न करायें-बालक, वृद्ध, अतिस्निग्ध (जिसने अत्यन्त स्नेहपान किया हो), जिसको उरःक्षत हो, जिसके धातुओं का क्षय हो गया हो, डरने वाला, थका हुआ, प्यासा, मोटा, गर्भवती,