शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें226 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे नवीन ज्वर से पीड़ित, नवप्रसूता स्त्री, जिसकी अग्नि मन्द हो, जिसने अधिक मद्यपान किया हो, जिसके शरीर में शल्य चुभ गया हो तथा जिसका कोष्ठ रूक्ष हो। वक्तव्य-इन्हें भी पित्त के बढ़ने पर थोड़ा-थोड़ा विरेचन दिया जा सकता है। विरेचन-योग्य रोगी जीर्णज्वरी गरव्याप्तो वातरक्ती भगन्दरी ।। 8 ।। अर्शःपाण्डूदरग्रन्थिहृद्रोगारुचिपीडिताः । योनिरोगप्रमेहार्ता गुल्मप्लीहव्रणार्दिताः ।। 9 ।। विद्रधिच्छर्दिविस्फोटविसूचीकुष्ठसंयुताः । कर्णनासाशिरोवक्त्रगुदमेढ्रामयान्विताः ।। 10 ।। यकृत्शोथाक्षिरोगार्ताः कृमिक्षीणाानिलार्दिताः । शूलिनो मूत्राघातार्ता विरेकार्हा नरा मताः ।। 11 ।। जिसको जीर्ण ज्वर हो, जिसको गर नामक विष के विकार हों, वातरक्त, भगन्दर, बवासीर, पाण्डुरोग, उदररोग, ग्रन्थिरोग (गण्डमाला आदि), हृद्रोग, अरुचि से पीड़ित, योनिरोग, प्रमेह से पीड़ित, वायुगोला, प्लीहा रोग, व्रण से पीड़ित, विद्रधि (व्रणविशेष), छर्दि (कै), विस्फोट (बड़ी माता), विसूची (इसमें दस्त तो होते ही हैं, अतः जब तक दोष निकल रहे हों, उन्हें रोकना नहीं चाहिये। अलसक और विलम्बिका में विरेचन अत्यावश्यक होता है। कुष्ठ से युक्त, और कान, नाक, सिर, मुख, गुद तथा लिङ्ग के रोगों से पीड़ित, यकृत्-विकार, शोथ, नेत्ररोगों से पीड़ित, क्रिमि, क्षार, वात रोगों से पीड़ित, शूल तथा मूत्राघात से पीड़ित ये मनुष्य विरेचन के योग्य माने जाते हैं। विरेचन के लिए कोष्ठ-भेद बहुपित्तो मृदुः कोष्ठो बहुश्लेष्मा च मध्यमः। बहुवातः क्रूरकोष्ठो दुर्विरेच्यः स कथ्यते ।। 12 ।। 'अधिक पित्तयुक्त कोष्ठ 'मृदु', अधिक कफ से युक्त कोष्ठ 'मध्यम' और अधिक वायु से युक्त कोष्ठ 'क्रूर' होता है और यह (क्रूर) दुर्विरेच्य (जिसका सुख से विरेचन नहीं होता) कहा जाता है। वक्तव्य-कोष्ठ की मृदुता आदि का विचार करके तदनुरूप विरेचन-औषधियों का प्रयोग करना उचित होता है। कोष्ठ-भेद से मात्रा-विचार मृद्वी मात्रा मृदौ कोष्ठे मध्यकोष्ठे च मध्यमा । क्रूरे तीक्ष्णा मता द्रव्याणामुच्यतेऽथ भिषग्वरैः ।। 13 ।। मृदु कोष्ठ में मृदु विरेचन कराने वाले द्रव्यों का मृदु मात्रा, मध्यम कोष्ठ में मध्यम विरेचन कराने वाले द्रव्यों की मध्यम मात्रा तथा क्रूर कोष्ठ में तीक्ष्ण विरेचन कराने वाले द्रव्यों की तीक्ष्ण मात्रा का प्रयोग करना चाहिये। कोष्ठ-भेद से द्रव्यों का विचार मृदुर्दाक्षापयश्चाम्बुतैलैरपि विरिच्यते। मध्यमस्त्रिवृतातिक्ताराजवक्षैर्वरिच्यते ।। 14 ।। क्रूरः स्नुक्पयसा हेमक्षीरीदन्तीफलादिभिः । मृदुकोष्ठ मुनक्का, दूध, गरम पानी तथा एरण्ड के तेल से ही विरक्त हो जाता है। मध्यमकोष्ठ निसोत, कुटकी तथा अमलतास की गुद्दी के सेवन से और क्रूरकोष्ठ सेहुण्ड के दूध, चोक (सत्यानासी की जड़) तथा जमालगोटा आदि के सेवन से विरक्त होता है। वेगभेद से विरेचन-मात्रा मात्रोत्तमा विरेकस्य त्रिंशद्वेगैः कफान्तगा ।। 15 ।। वेगैर्विंशतिभिर्मध्या हीनोक्ता दशवेगिका। विरेचन की 'उत्तम' मात्रा तीस वेगों (30 बार दस्त होने) की होती है, किन्तु अन्तिम वेग में कफ आना चाहिये। बीस वेगों का 'मध्यम' और दस वेगों की 'हीन' मात्रा होती है। विरेचन-द्रव्यों का मान-विचार द्विपलं श्रेष्ठमाख्यातं मध्यमं च पलं भवेत् ।। 16 ।। पलार्धं च कषायाणां कनीयस्तु विरेचनम्। कल्कमोदकचूर्णानां कर्षं मध्वाज्यलेहतः ।। 17 ।। कर्षद्वयं पलं वापि वयोगोगाद्यपेक्षया। विरेचन द्रव्यों के कषायों (स्वरस, क्वाथ आदि) की 'उत्तम' मात्रा दो पल, 'मध्यम' मात्रा एक पल तथा 'कनीयसी या हीन' मात्रा एक पल की होती है और कल्क चूर्ण तथा अवलेहों की मात्रा एक 'कर्ष' (एक तोला) दो कर्ष अथवा एक पल (4 कर्ष) होती है। इसे मधु तथा घी के साथ मिलाकर चाटने योग्य बना लेना चाहिये और उक्त नियम का पालन रोगी की आयु तथा रोग आदि (देश, काल, कोष्ठ तथा औषधि बल) का विचार कर करना चाहिये। दोष-भेद से द्रव्य-विधान पित्तोत्तरे त्रिवृच्चूर्णं द्राक्षाक्वाथादिभिः पिबेत् ।। 18 ।। त्रिफलाक्वाथगोमूत्रैः पिबेद् व्योषं कफार्दितः।