भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 356 में से

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पृष्ठ 263

चतुर्थोऽध्यायः] विरेचनविधिः 227 --- [बायाँ स्तम्भ] --- त्रिवृत्सैन्धवशुण्ठीनां चूर्णमम्लैः पिबेन्नरः ।। १९ ।। वातार्दितो विरेकाय जाङ्गलानां रसेन वा। पित्तोत्तर कोष्ठ में निसोत का चूर्ण, द्राक्षा (मुनक्का), क्वाथ दूध आदि के साथ पीना चाहिये। कफ से पीड़ित मनुष्य त्रिकटुचूर्ण को त्रिफलाक्वाथ अथवा गोमूत्र के साथ पीये तथा वात से पीड़ित कोष्ठ बाला मनुष्य विरेचन के लिये निसोत, सेंधा नमक तथा सोंठ के चूर्ण के अमृत द्रव (काँजी आदि) अथवा जाङ्गल देश के प्राणियों (हरण आदि) के मांसरस के साथ पीये। एरण्ड तैल-प्रयोग एरण्डतैलं त्रिफलाक्वाथेन द्विगुणेन च ।। २० ।। युक्तं पीतं पयोभिर्वा न चिरेण विरिच्यते। एरण्ड का तेल दुगुने त्रिफलाक्वाथ अथवा दूध के साथ विधिवत् पीने से शीघ्र ही विरेचन करा देता है। त्रिवृता कौटजं बीजं पिप्पली विश्वभेषजम् ।। २१ ।। समृद्धीकारसक्षौद्रं वर्षाकाले विरेचनम् । त्रिवृद्दुरालभा मुस्ता शर्करोदीच्यचन्दनम् ।। २२ ।। द्राक्षाम्बुना सयष्टीकं शीतलं च घनात्यये। (त्रिवृतां चित्रकं पाठामजाजीं सरलां वचाम् ।। २३ ।। हेमक्षीरीं च हेमन्ते चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत्।) पिप्पली नागरं सिन्धु श्यामा त्रिवृतया सह ।। २४ ।। लिहेत् क्षौद्रेण शिशिरे वसन्ते च विरेचनम्। त्रिवृता शर्करा तुल्या ग्रीष्मकाले विरेचनम् ।। २५ ।। निसोत, इन्द्रजौ, पीपल तथा सोंठ का चूर्ण, मुनक्का के रस तथा मधु के साथ मिलाकर खाने से 'वर्षा ऋतु' में विरेचन होता है। निसोत, धमासा, मोथा, खाँड़, नेत्रबाला, सफेद चन्दन, मुलेठी का चूर्ण मुनक्का के रस के साथ मिलाकर सेवन करने से 'शरदऋतु' में विरेचन होता है और यह शीतल है। निसोत, चीता, पाठा, जीरा, सरल, वच तथा सत्यानासी की जड़ का चूर्ण उष्ण जल के साथ 'हेमन्तऋतु' में पीना चाहिये। पीपल, सोंठ, सेंधा नमक तथा कालीनिसोत का चूर्ण मधु के साथ मिलाकर खाने से 'शिशिर' तथा 'वसन्त' ऋतु में विरेचन होता है और निसोत का चूर्ण तथा खाँड़ समान भाग में लेकर खाने से 'ग्रीष्म ऋतु' में विरेचन होता है। सब ऋतुओं के योग्य विरेचन त्रिवृतां हपुषां दन्तीं सप्तलां कटुरोहिणीम्। स्वर्णक्षीरीं च सञ्चूर्ण्य गोमूत्रे भावयेत् त्र्यहम् ।। २६ ।। --- [दायाँ स्तम्भ] --- एष सर्वर्तुको योगः स्निग्धानां मलदोषहा। निसोत, दन्ती, हाऊबेर, सप्तपर्णी, कुटकी तथा चोक का चूर्ण बनायें और तीन दिन तक गोमूत्र की भावना दें, यह 'सर्वर्तुक योग' अर्थात् सब ऋतुओं में सेवन करने योग्य योग है। यह स्निग्ध मनुष्यों के मलदोष को दूर करता है। अभयादि मोदक अभया मरिचं शुण्ठीविडङ्गामलकानि च। पिप्पली पिप्पलीमूलं त्वक्पत्रं मुस्तमेव च ।। २७ ।। एतानि समभागानि दन्ती च द्विगुणा भवेत्। त्रिवृदष्टगुणा ज्ञेया षड्गुणा चात्र शर्करा ।। २८ ।। मधुना मोदकान् कृत्वा कषमात्रप्रमाणतः। एकैकं भक्षयेत् प्रातः शीतं चानु पिबेज्जलम् ।। २९ ।। तावद् विरिच्यते जन्तुर्यावदुष्णं न सेवते। पानाहारविहारेषु भवेन्निर्यन्त्रणः सदा ।। ३० ।। विषमज्वरमन्दाग्निपाण्डुकासभगन्दरान् । दुर्नामकूष्ठगुल्मार्शोगलगण्डभ्रमोदरान् ।। ३१ ।। (विदाहप्लीहमेहांश्च यक्ष्माणं नयनामयान्। वातरोगस्तथाध्मानं मूत्रकृच्छ्राणि चाश्मरीम् ।। ३२ ।।) पुष्पपार्श्वोरुजघनजङ्घोदररुजो जयेत्। सततं शीलनादेषां पलितानि प्रणाशयेत् ।। ३३ ।। अभयामोदका ह्येते रसायनवराः स्मृताः। बड़ी हरड़, मरिच, सोंठ, वायविडंग, आँवला, पीपल, पीपलामूल, दालचीनी, तेजपत्ता तथा नागरमोथा-ये सब द्रव्य समभाग (1-1 तोला), दन्ती दो भाग (2 तोला), निसोत आठ भाग (8 तोला) तथा खाँड छह भाग (6 तोला), उक्त सभी द्रव्यों को चूर्ण रूप में लेकर मधु के योग से एक-एक कर्ष (1-1 तोला) के मोदक (लड्डू) बना लें। एक मोदक प्रातःकाल खायें और अनुपान में शीतल जल पीयें। इससे तब तक विरेचन होता जाता है, जब तक उष्ण जल नहीं पी लिया जाता। इस औषध का सेवन करते समय पान, आहार तथा विहार में किसी प्रकार का बन्धन या नियम रखने का आवश्यकता नहीं है। यह औषध विषमज्वर, मन्दाग्नि, पाण्डुरोग, कास, भगन्दर, बवासीर, कुष्ठ, वायुगोला की पीड़ा, गलगण्ड, भ्रम, उदररोग, दाह, प्लीहा-विकार, प्रमेह, राजयक्ष्मा, नेत्ररोग, वातव्याधि, अफरा, मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी (पथरी) तथा पीठ, पार्श्व (पसली एवं फुफ्फुस), ऊरु, जघन या जंघा CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

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