शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें232 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे व्रणवस्ति (इससे व्रण धोये जाते हैं) का नेत्र श्लक्ष्ण, (चिकना) आठ अङ्गुल लम्बा, मूँग के समान छिद्र वाला तथा गिद्ध के पँख की नलिका के समान मोटा होना चाहिये। वस्ति के सम्यग्योग का फल शरीरोपचयं वर्णं बलमारोग्यमायुषः ।। 15 ।। कुरुते परिवृद्धिं च वस्तिः सम्यगुपासितः। विधिपूर्वक सेवन करने से वस्ति शरीर का पुष्टि, वर्ण, बल, आरोग्य तथा आयु की वृद्धि करती है। वस्ति के लिए समय-निर्देश दिवा शीते वसन्ते च स्नेहवस्तिः प्रदीयते ।। 16 ।। ग्रीष्मवर्षाशरत्काले रात्रौ स्यादनुवासनम्। शीतकाल (हेमन्त तथा शिशिर ऋतु) में तथा वसन्त ऋतु में दिन में तथा ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद् ऋतु में रात्रि में स्नेहवस्ति (अनुवासन वस्ति) दी जाती है। वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि समशीतोष्ण काल में ही वस्ति देना उचित होता है। वस्ति के पूर्व भोजन-निर्देश न चातिस्निग्धमशनं भोजयित्वाऽनुवासयेत् ।। 17 ।। मदं मूर्च्छां च जनयेद् द्विधा स्नेहः प्रयोजितः। रूक्षं भुक्तवतोऽप्यन्नं बलं वर्णञ्च हीयते ।। 18 ।। अत्यन्त स्निग्ध भोजन खिलाकर अनुवासन वस्ति नहीं देनी चाहिये, क्योंकि दोनों ओर (मुख तथा गुद) से प्रयुक्त किया हुआ स्नेह मद तथा मूर्च्छा को उत्पन्न कर देता है। अत्यन्त रूक्ष भोजन कराकर भी वस्ति देने से बल तथा वर्ण की हानि होती है। वस्ति की मात्रा के दोष हीनमात्रावुभौ बस्ती नातिकार्यकरौ स्मृतौ। अतिमात्रौ तथाऽऽनाहक्लमातीसारकारकौ ।। 19 ।। अनुवासन तथा निरूहण ये दोनों ही वस्तियाँ हीनमात्रा (उचित से कम मात्रा) से देने पर उचित कार्य करने वाली नहीं होती और अतिमात्रा से देने पर आनाह, क्लम (सुस्ती) तथा अतिसार को उत्पन्न कर देती हैं। वस्ति-मात्रा-निर्देश उत्तमस्य पलैः षड्भिर्मध्यमस्य पलैस्त्रिभिः। पलास्यार्धेन हीनस्य युक्ता मात्रानुवासने ।। 20 ।। उत्तम (बलवान्) पुरुष के लिए अनुवासन (स्नेह) की मात्रा छः पल की, मध्यम के लिए तीन पल की और हीन (दुर्बल) के लिए डेढ़ पल (6 तोला) मात्रा उचित होती है। अनुवासन-वस्ति के द्रव्य शताह्वासैन्धवाभ्यां च देयं स्नेहे च चूर्णकम्। तन्मात्रोत्तममध्यान्ताः षट्चतुर्द्वयमाषकैः ।। 21 ।। स्नेह में सौंफ तथा सेंधा नमक का चूर्ण अवश्य दिया जाता है। उसकी मात्रा उत्तम पुरुष के लिए 6 माशा, मध्यम के लिए चार माशा तथा हीन के लिए दो माशा होनी चाहिये। वक्तव्य-वस्ति-प्रयोग के लिए स्नेह द्रव्य को गुनगुना कर लेना चाहिये। इससे वह शीघ्र ही लौट आता है। विरेचन के पश्चात् वस्ति विरेचनात् सप्तरात्रे गते जातबलाय च। भुक्तान्नायानुवास्याय वस्तिर्देयोऽनुवासनः ।। 22 ।। विरेचन के पश्चात् सात दिन बीतने पर जब रोगी बलवान् हो जाये, अन्न खाने लग जाये तथा अनुवासन के योग्य समझा जाये, तब उसे अनुवासन वस्ति देनी चाहिये। वस्ति देने की विधि अथानुवास्यं स्वभ्यक्तमुष्णाम्बुस्वेदितं शनैः। भोजयित्वा यथाशास्त्रं कृतचङ्क्रमणं ततः ।। 23 ।। उत्सृष्टानिलविण्मूत्रं योजयेत् स्नेहवस्तिना। सुप्तस्य वामपार्श्वेन वामजङ्घाप्रसारिणः ।। 24 ।। कुञ्चितापरजङ्घस्य नेत्रं स्निग्धगुदे न्यसेत्। बद्ध्वा वस्तिमुखं सूत्रैर्वामहस्तेन धारयेत् ।। 25 ।। पीडयेद् दक्षिणेनैव मध्यवेगेन धीरधीः। जृम्भाकासक्षवार्दींश्च वस्तिकाले न कारयेत् ।। 26 ।। इसके पश्चात् अनुवासन के योग्य मनुष्य को भली-भाँति अभ्यंग (मालिश) करें, फिर उष्ण जल से धीरे-धीरे स्वेदन करें। रोगी को शास्त्रानुसार भोजन कराकर चंक्रमण (टहलना) करायें, इसके पश्चात् अपानवायु, मल तथा मूत्र का परित्याग कराकर स्नेहवस्ति का प्रयोग करें। रोगी को बाँयी करवट लिटा दें और बाँयी टाँग फैलाकर वस्ति का प्रयोग करें तथा दाहिनी टाँग को संकुचित करवा दें, गुद को स्नेह (तैल) द्वारा स्निग्ध करके नेत्र (नलिका) को प्रविष्ट कर दें। इस नेत्र पर वस्ति को धागा या डोरा द्वारा बाँधकर नेत्र को बाँये हाथ से सम्भालकर पकड़े और दाहिने हाथ से स्नेह भरी हुई वस्ति को मध्यवेग से दबाना चाहिये, यह कार्य धैर्यपूर्वक करें।