शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें234 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ] बलं वर्णं च जनयेत् तृतीयस्तु प्रयोजितः। चतुर्थपञ्चमौ दत्तौ स्नेहेयतां रसासृजी॥३६॥ षष्ठो मांसं स्नेहयति सप्तमो मेद एव च। अष्टमो नवमश्चापि मज्जानं च यथाक्रमम्॥३७॥ एवं शुक्रगतान् दोषान् द्विगुणः साधु साधयेत्।) अष्टादशाष्टादशकान् बस्तीनां यो निषेवते॥३८॥ स कुञ्जरबलोऽप्यश्वं जयेत् तुल्योऽमरप्रभः। पहली वस्ति (मूत्राशय) तथा वंक्षण (मूत्रवाही के दोनों स्रोतों तथा वृक्कों) को स्निग्ध कर देती है। विधिपूर्वक दी हुई दूसरी वस्ति शिर तक की वायु (दूषित वायु) को जीतती अथवा शान्त करती है, तीसरी वस्ति बल तथा वर्ण (कान्ति) को उत्पन्न कर देती है, चौथी और पाँचवीं रस और रक्त को स्निग्ध कर देती है, छठी मांस को तथा सातवीं मेदा को स्निग्ध कर देती है, आठवीं तथा नौवीं हड्डी तथा मज्जा को स्निग्ध कर देती है। इस प्रकार दुगुनी अर्थात् अठारह वस्तियाँ शुक्रगत दोषों को सिद्ध (शान्त) कर देती है। इसी प्रकार 18 बार वस्ति का प्रयोग करने वाला पुरुष हाथी के समान बलवान् तथा घोड़े के समान वेगवान् होकर देवताओं के सदृश कान्तिमान् हो जाता है। वातरोगाी के लिए स्नेह-वस्ति रूक्षाय बहुवाताय स्नेहबस्तिं दिने दिने॥३९॥ दद्याद्वैद्यस्तथान्येषामग्न्याबाधभयात् त्र्यहात्। कुशल चिकित्सक रूक्ष शरीर वाले तथा वातपीड़ित शरीर वाले मनुष्य के लिए प्रतिदिन स्नेहवस्ति दे सकता है और दूसरे लोगों को अग्निमांद्य के भय से तीसरे दिन वस्ति देना उचित है। स्नेह तथा निरूहवस्ति की प्रशंसा स्नेहोऽल्पमात्रो रूक्षाणां दीर्घकालमनत्ययः॥४०॥ तथा निरूहः स्निग्धानामल्पमात्रः प्रशस्यते।) रूक्ष मनुष्यों को अल्प मात्रा वाली स्नेहवस्ति का दीर्घ (लम्बे) काल (समय) तक सेवन करने पर भी हानिकारक नहीं होती और इसी प्रकार स्निग्ध मनुष्यों को अल्प मात्रा वाली निरूहणवस्ति भी प्रशस्त मानी जाती है। वक्तव्य—उक्त पद्य का तात्पर्य यह है कि आवश्यकतानुसार एक ही वस्ति एक से अधिक बार भी दी जा सकती है।
[दायाँ स्तम्भ] स्नेह-वस्ति के निकलने पर अथवा यस्य तत्कालं स्नेहो निर्याति केवलः॥४१॥ तस्यान्योऽन्यतरो देयो न हि स्निह्यत्यतिष्ठति। अथवा जिस मनुष्य का वस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह तत्काल अकेला ही निकल जाये, उसको दुबारा थोड़ा-सा स्नेह दे देना चाहिये, क्योंकि स्नेह के पक्वाशय में रुके बिना भली-भाँति स्नेहन नहीं होती। स्नेह-वस्ति के उपद्रव और प्रतिकार अशुद्धस्य मलोन्मिश्रः स्नेहो नैति यदा पुनः॥४२॥ तदा शैथिल्यमाध्मानं शूलं श्वासश्च जायते। पक्वाशये गुरुत्वं च तत्र दद्यान्निरूहणम्॥४३॥ तीक्ष्णं तीक्ष्णौषधैर्युक्ता फलवर्त्तिर्हिता तथा। यथानुलोमनं वायुर्मलः स्निग्धश्च जायते॥४४॥ तथा विरेचनं दद्यात् तीक्ष्णं नस्यं च शस्यते। जब अशुद्ध (जिसे शोधन नहीं दिया गया है) मनुष्य का स्नेह मल को लेकर नहीं निकलता है, तब उसको शिथिलता, अफरा, शूल, श्वास तथा पक्वाशय में भारीपन हो जाता है, ऐसी स्थिति में तीक्ष्ण द्रव्यों का निरूहण देना चाहिये अथवा तीक्ष्ण द्रव्यों की 'फलवर्ति' लाभप्रद होती है। इससे वायु का अनुलोमन (स्वमार्गगामी) और मल स्निग्ध हो जाता है। अतः तीक्ष्ण विरेचन और तीक्ष्ण नस्य का प्रयोग करना चाहिये। वक्तव्य—'फलवर्ति', बत्ती नाम से प्रसिद्ध ही इसका निर्माण स्नेह और क्षार के मिश्रण से किया जाता है। यह एलोपैथिक दवाखानों में मिलती है। यह नहाने के साबुन से भी तैयार की जा सकती है। इसे गुदद्वार में चढ़ा देने से तत्काल मल निकल जाता है और सम्बन्धित उपद्रव शान्त हो जाते हैं। फलवर्त्ति का विधान शा०सं०, उ०खं० अ० 7 श्लोक में देखें। उपद्रवहीन स्नेह-वस्ति यस्य नोपद्रवं कुर्यात् स्नेहवस्तिरनिःसृतः॥४५॥ सर्वोऽल्पो वा वृते रौक्ष्यादुपेक्ष्यः स विजानता। जिसको स्नेहवस्ति भीतर रह जाने पर भी शिथिलता आदि उपद्रवों को उत्पन्न न करे, भले ही रूक्षता के कारण सब की सब अथवा थोड़ी-बहुत भीतर रह गयी हो, उसकी उपेक्षा करे देनी चाहिये। वक्तव्य—तात्पर्य यह है कि वस्ति द्वारा दिया हुआ स्नेह यदि कुछ कष्ट न दें, तो उसके निकालने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती है।