भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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दशमोऽध्यायः] गण्डूषादिविधिः 257


[वाम स्तम्भ]

व्याधि का घट जाना, रोगी के हृदय में परितोष, मुख में हलकापन और इन्द्रियों में प्रसन्नता-ये गण्डूष की सम्यक् शुद्धि के लक्षण हैं। दतवन या दातून-'कषायं मधुरं तिक्तं कटुकं प्रातरुत्थितः। भक्षयेद् दन्तपवनं दन्तमांसान्यबाधयन्।। निहन्ति गन्धं वैरस्यं जिह्वादन्तास्यजं मलम्। निष्कृष्य रुचिमाधत्ते दन्तरोगविनाशनम्'।। अर्थात् प्रातःकाल शौचादि से निवृत्त होकर कषायरस (खैर, बबूर आदि), मधुर या मीठी (महुआ आदि), तिक्त (नीम आदि) तथा कटुरस (तेजबल आदि) वाली दतवन करें, किन्तु मसूड़ों पर किसी प्रकार बाधा (खरोच आदि) न आने पाये। दतवन मुख की दुर्गन्ध तथा विरसता को, जीभ, दाँत तथा मुख के मल को दूर कर रुचि को उत्पन्न करती है और दाँतों के रोगों को नष्ट करती है।


[दक्षिण स्तम्भ]

ताम्बूल सेवन-'कर्पूरजातीकङ्कोललवङ्गकटकाह्वयैः। सचूर्णपूगैः सहितं पत्रं ताम्बूलजं शुभम्।। मुखवैशद्य- सौगन्ध्यकान्तिसौष्ठवकारकम्। हनुदन्तस्वरमलजिह्वेन्द्रिय- विशोधनम्।। प्रसेकशमनं हृद्यं गलामयविनाशनम्। पथ्यं सुप्तोत्थिते भुक्ते स्नाते वान्ते च मानवे'।। अर्थात् ताम्बूल का पत्र, कपूर, जावित्री, शीतलचीनी, लौंग, लताकस्तूरी, साफ चूना तथा सुपारी से युक्त उत्तम होता है। वह मुख को स्वच्छ, सुगन्धित, कान्तिमान् तथा सुन्दर बनाता है; कपोल, दाँत, स्वर, मल तथा जीभ को शुद्ध करता है; थूक की अधिकता को कम करता है; हृदय को शक्ति देता है; गल के रोगों को नष्ट करता है। दातून सोकर उठने पर, भोजन करने पर, स्नान करने पर तथा वमन के पश्चात् करने पर पथ्य (लाभदायक) होता है।


इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का दसवाँ अध्याय समाप्त।। 10 ।।


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