शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशोऽध्यायः ] लेपमूर्धतैलकर्णपूरणविधिः 259
[बायाँ स्तम्भ]
(तोर्ई) तथा मूली के बीज इनको पीसकर काँजी के साथ लेप करने से कीड़ों का विष तथा विस्फोट नष्ट हो जाते हैं। रक्तचन्दनादि लेप रक्तचन्दनमञ्जिष्ठालोध्रकुष्ठप्रियङ्गवः । वटाङ्कुरा मसूराश्च व्यङ्गघ्ना मुखकान्तिदाः ।। 9 ।। लालचन्दन, मजीठ, लोध, कूठ, फूलप्रियंगु, वट के अंकुर और मसूर का आटा का लेप व्यंग (झाँई) को नष्ट करता है और मुख की कान्ति को बढ़ाता है। मातुलुङ्गादि लेप मातुलुङ्गिजटा सर्पिः शिला गोशकृतो रसः । मुखकान्तिकरो लेपः पिटिकाव्यङ्गकालजित् ।। 10 ।। बिजौरा नींबू की जड़, घी, मैनसिल और गाय के गोबर का रस-इनका लेप मुख की कान्ति को बढ़ाता है और मुहासों तथा कालिमा को नष्ट करता है। लोध्रादि लेप लोध्रधान्यवचालेपस्तारुण्यपिटिकापहः । तद्वद् गोरोचनायुक्तं मरिचं मुखलेपनम् ।। 11 ।। लोध, धनियाँ तथा वच का लेप, गोरोचन तथा मरिच का लेप मुँहासों को नष्ट करता है। सिद्धार्थकादि लेप सिद्धार्थकवचालोध्रसैन्धवैश्च प्रलेपनम्। व्यङ्गेषु चार्जुनत्वग्वा मञ्जिष्ठा वा समाक्षिका ।। 12 ।। सरसों, वच, लोध और सेंधा नमक का लेप अथवा अर्जुन की छाल तथा मजीठ का मधु मिलाकर किया गया लेप व्यंगों में लाभदायक होता है। अश्वखुरमसी-लेप लेपः सनवनीतो वा श्वेताश्वखुरजा मषी। अर्कक्षीरहरिद्राभ्यां मर्दयित्वा विलेपनात् ।। 13 ।। मुखकार्ण्यं शमं याति चिरकालोद्भव ध्रुवम्। सफेद घोड़े के खुर की भस्म, आक का दूध, हल्दी तथा मक्खन का लेप मुख की बहुत पुरानी कृष्णता (झाँई) को शान्त करता है। वटपत्रादि लेप वटस्य पाण्डुपत्राणि मालती रक्तचन्दनम् ।। 14 ।। कुष्ठं कालीयकं लोध्रमेभिर्लेपं प्रयोजयेत्। तारुण्यपिटिकाव्यङ्गनीलिकादिविनाशनम् ।। 15 ।।
[दायाँ स्तम्भ]
बरगद के पीले पत्ते, चमेली के पत्ते, लालचन्दन, कूठ, कालागुरु तथा लाध का लेप लगाना चाहिये। इससे मुँहासे, व्यंग तथा नीलिका आदि नष्ट हो जाते हैं। वक्तव्य- उक्त सभी लेप मुखमण्डल (चेहरे) पर होने वाले सुन्दरता नाशक विकारों का शान्त करने के लिए कहे गये हैं। अरुषिकाहर लेप पुराणमथ पिण्याकं पुरीषं कुक्कुटस्य च। मूत्रपिष्टः प्रलेपोऽयं शीघ्रं हन्यादरुषिकाम् ।। 16 ।। पुरानी खली और मुरगा की बीट इन दोनों का गोमूत्र में पीसकर किया हुआ लेप शीघ्र ही (आठ-दस दिन में) 'अरुषिका' को नष्ट कर देता है। दूसरा लेप खदिरारिष्टजम्बूनां त्वग्भिर्वा मूत्रसंयुतैः । कुटजत्वक् सैन्धवं च लेपो हन्यादरुषिकाम् ।। 17 ।। खैर, नीम और जामुन के छिलकों को गोमूत्र में पीसकर किया हुआ लेप अथवा कुरैया की छाल तथा सेंधा नमक का लेप 'अरुषिका' को नष्ट-करता है। वक्तव्य- शिरःप्रदेश में जो अत्यन्त छोटी-छोटी फुन्सियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनमें से पीला मवाद निकलकर वहीं पर जमता जाता हैं, जिससे माथे से दुर्गन्ध आने लगती है, बाल उखड़ जाते हैं। उसी को 'अरुषिका' कहते हैं। दारुणरोगहर लेप (1) प्रियालबीजमधुककुष्ठमाषैः ससैन्धवैः। कार्यो दारुणके मूर्ध्नि प्रलेपो मधुसंयुतः ।। 18 ।। चिरौंजी के बीज, मुलेठी, कूठ, उड़द एवं सेंधा नमक-इन सबको पीसकर तथा मधु मिलाकर 'दारुणक' नामक रोग में शिर पर लेप करना चाहिये। दारुणरोगहर लेप (2) दुग्धेन खाखसं बीजं प्रलेपाद् दारुणं जयेत्। आन्त्रबीजस्य चूर्णं तु शिवाचूर्णसमं द्वयम् ।। 19 ।। दुग्धपिष्टः प्रलेपोऽयं दारुणं हन्ति दारुणम्। खसखस (पोस्ता दाना) को दूध के साथ पीसकर लेप करने से 'दारुणक' रोग को जीतता है। आम की गिरी का चूर्ण तथा हरड का चूर्ण दोनों को समान भाग में लेकर और दूध में पीसकर लेप करें। यह भी 'दारुणक' को नष्ट करता है।
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