भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 356 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (Text) दिया गया है:


[पृष्ठ २६०]

२६० | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

वक्तव्य—दारुणक को ‘रूसी’ कहा जाता है। यह बालों में कंघी करते समय झड़ा करती है। वस्तुतः ‘अरुषिका’ को ही रूसी कहना उचित है न कि ‘दारुणक’ को।

इन्द्रलुप्तहर लेप

रसस्तिक्तपटोलस्य पत्राणां तद्विलेपनात्॥२०॥ इन्द्रलुप्तं शमं याति त्रिभिरेव दिनैर्ध्रुवम्। इन्द्रलुप्तापहो लेपो मधुना बृहतीरसः॥२१॥ गुञ्जामूलं फलं वापि भल्लातकरसोऽपि वा। कड़वे परवल के पत्तों का रस निकाल लें। इसका लेप करने से इन्द्रलुप्त तीन दिन में अवश्य नष्ट हो जाता है। बनभण्टा का रस मधु के साथ मिलाकर अथवा गुंजा की जड़ या फल या भिलावा का रस मधु के साथ मिलाकर लेप करने से इन्द्रलुप्त को नष्ट करता है।

वक्तव्य—दाढ़ी तथा मोछ के बालों का उखड़ना ‘इन्द्रलुप्त’ कहा जाता है।

केशवर्द्धक लेप

गोक्षुरस्तिलपुष्पाणि तुल्ये च मधुसर्पिषी॥२२॥ शिरःप्रलेपनं तेन केशसंवर्धनं परम्। गोखरू, तिल के फूल, मधु एवं घृत का लेप करने से शिर के बाल भली-भाँति बढ़ते हैं।

रोमोत्पादक लेप

हस्तिदन्तमषीं कृत्वा छागीदुग्धं रसाञ्जनम्॥२३॥ रोमाण्यनेन जायन्ते लेपात् पाणितलेष्वपि। हाथी के दाँत की भस्म और रसवत् दोनों को बकरी के दूध में पीसकर लेप करने से पाणितलों (हथेली) पर भी रोम उत्पन्न हो जाते हैं।

वक्तव्य—पाणितलों में रोमकूप होते ही नही तो रोम कहाँ से उत्पन्न होंगे। यह उक्त योग की सफलतासूचक अतिशयोक्ति मात्र नहीं है, अपितु रोमों को उगाने का सफल प्रयोग भी है।

इन्द्रलुप्तहर लेप

यष्टीन्दीवरमृद्वीकातैलाज्यक्षीरलेपनैः ॥२४॥ इन्द्रलुप्तं शमं याति केशाः स्युः सघना दृढाः। मुलेठी, कमल, मुनक्का, तेल, घृत और दूध के लेप से इन्द्रलुप्त शान्त हो जाता है। उससे केश दृढ़ और सघन हो जाते हैं।


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

रोमसंजनन लेप

चतुष्पदानां त्वग्रोमनखशृङ्गास्थिभस्मभिः॥२५॥ तैलेन सह लेपोऽयं रोमसंजननः परः। चौपायों (गाय घोड़ा, बकरा आदि) की त्वचा, रोम, नख, सींग तथा हड्डी की भस्मों को तेल के साथ मिलाकर लेप करने से रोम अवश्य उत्पन्न हो जाते हैं।

वक्तव्य—इन्द्रलुप्त, खालित्य तथा रुह्या में रोम उखड़ जाने पर उक्त लेप करना चाहिये।

पलितनाशक लेप (१)

इन्द्रवारुणिकाबीजतैलेनाभ्यङ्गमाचरेत् ॥२६॥ प्रत्यहं तेन जायन्ते कुन्तला भृङ्गसन्निभाः। इन्द्रवारुणी (इन्द्रायण) के बीजों के तैल का अभ्यंग (मालिश) प्रतिदिन करने से केश भार के समान काले हो जाते हैं।

पलितनाशक लेप (२)

अयोरजो भृङ्गराजस्त्रिफला कृष्णमृत्तिका॥२७॥ स्थितमिक्षुरसे मासं लेपनात् पलितं जयेत्। लोहचूर्ण, भाँगरा, त्रिफला और काली मिट्टी–इन सबको ईख के रस में एक मास तक रख दें, तत्पश्चात् इसका लेप करने से ‘पलित’ रोग नष्ट हो जाता है।

पलितनाशक लेप (३)

धात्रीफलत्रयं पथ्ये द्वे तथैकं बिभीतकम्॥२८॥ पञ्चाम्रमज्जा लोहस्य कर्षैकं च प्रदीयते। पिष्ट्वा लोहमये भाण्डे स्थापयेदुषितं निशि॥२९॥ लेपोऽयं हन्ति नचिरादकालपलितं महत्। आँवला के फल ३, हरड़ के फल २, बहेड़ा का फल १, आम की गिरी ५ नग और लोह, चूर्ण १ तोला–इन सबको पीसकर लोहपात्र में रात भर रख लें। यह लेप बहुत अधिक ‘अकाल-पलित’ को शीघ्र ही जीतता है।

वक्तव्य—ईख के रस के योग से उक्त द्रव्यों का कल्क बनाकर रख लें। आवश्यकता पड़ने पर इसका प्रयोग किया जा सकता है।

पलितनाशक लेप (४)

त्रिफला नीलिकापत्रं लोहं भृङ्गरजः समम्॥३०॥ अविमूत्रेण सम्पिष्टं लेपात् कृष्णीकरं स्मृतम्। त्रिफला, नील के पत्ते, लोहचूर्ण तथा भाँगरा को समान