भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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268 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे मरिच, सेंधा नमक, पीपल, तगर, बनभण्टा के फल, दुर्गन्धिनाशक योग (2) अपामार्ग के बीज, तिल, कूठ, जौ, उड़द, सरसों तथा कुलित्थसक्तवः कुष्ठं मांसी चन्दनजं रजः ।। 118 ।। असगन्ध-इन सबको पीसकर मधु में मिलाकर रख लें। इसका सक्तवश्चणकस्यैव त्वक् चैवैकत्र कारयेत्। निरन्तर (महीनों तक लगातार) लेप करने और मर्दन करने स्वेददौर्गन्ध्यनाशश्च जायतेऽस्यावधूलनात् ।। 119 ।। से लिङ्ग की वृद्धि होती है, स्तनों पर लेप करने से स्तन पुष्ट कुलथी का सत्तू, कूठ, जटामांसी, श्वेतचन्दन का चूर्ण, हो जाते हैं और बाहु तथा कान दृढ़ हो जाते हैं। चने का सत्तू तथा दालचीनी-ये सब एक साथ मिलाकर लिङ्गवृद्धिकर लेप (2) शरीर पर अवधूलन करने (बुरकने या चुपड़ने) से स्वेद सिताश्वगन्धासिन्धूत्थछागक्षीरैर्धृतं पचेत्। (पसीना) तथा दुर्गन्धि का नाश हो जाता है। तल्लेपान्मर्दनाल्लिङ्गवृद्धिः सञ्जायते परा ।। 115 ।। वक्तव्य-कुलथी आदि उपर्युक्त पदार्थ को भूनकर पीस मिश्री, असगन्ध तथा सेंधा नमक का कल्क, बकरी का लेने से सत्तू (पाउडर) तैयार हो जाता है। इसके प्रयोग से दूध मिलाकर विधिपूर्वक घी पकाना चाहिये। इसके लेप तथा शारीरिक दुर्गन्धि का नाश हो जाता है। मर्दन से आवश्यकतानुसार लिंग की वृद्धि हो जाती है। वशीकरण लेप वक्तव्य-पति-पत्नी के मनमुटाव, कलह या प्रेमाभाव वचा सौवर्चलं कुष्ठं राजन्यौ मरिचानि च। का पता उनसे वार्तालाप करते समय लिंगवृद्धि आदि की एतल्लेपप्रभावेण वशीकरणमुत्तमम् ।। 120 ।। आवश्यकता का पता लग जाता है। कभी-कभी रोगी स्वयं वच, कालानमक, कूठ, हल्दी, दारुहल्दी तथा मरिच चिकित्सक के पास आकर अपनी दशा सुना देता है। ये को पीसकर लेप करें। इस लेप के प्रभाव से उत्तम वशीकरण प्रयोग समय की माँग के अनुसार प्रयुक्त होते हैं, समझदारी होता है। इसी में है कि योनिसंकोचक तथा लिंगवृद्धिकर योगों का शिर पर तैल लगाने की विधि प्रयोग नहीं करना चाहिये। अभ्यङ्गः परिषेकश्च पिचुर्बस्तिरिति क्रमात्। योनिद्रावक लेप मूर्धतैलं चतुर्धा स्याद् बलवच्च यथोत्तरम् ।। 121 ।। इन्द्रवारुणिकापत्ररसैः सूतं विमर्दयेत्। त्रयोऽभ्यङ्गादयः पूर्वे प्रसिद्धाः सर्वतः स्मृताः। रक्तस्य करवीरस्य काष्ठेन व मुहुर्मुहुः ।। 116 ।। शिरोबस्तिविधिश्चात्र प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः ।। 122 ।। तल्लिप्तलिङ्गसंयोगाद् योनिद्रावोऽभिजायते। शिर-पर तैल का प्रयोग करने के चार प्रकार हैं। यथा-1 पारद को इन्द्रायण के पत्तों के रस में डालकर लाल अभ्यंग (मालिश करना), 2. परिषेक (शिर पर तैल की धार कनेर का लकड़ी से बार-बार (सात दिन तक) मर्दन करें। गिराना), 3. पिचु (फाहा भिगाकर रखना) और 4. वस्ति। इसका लेप लिंग पर करके स्त्री संयोग करने से 'योनिद्राव' हो ये उत्तरोत्तर (एक से दूसरा) बलवान् अर्थात् अधिक जाता है। लोभदायक है। इनमें पहले अभ्यंग आदि तीन प्रयोग सर्वत्र वक्तव्य-जब योनि स्पर्शसुख रहित हो जाती है, तब प्रसिद्ध है, अर्थात् साधारण लोग भी जानते हैं और शिरोबस्ति मैथुन करने पर भी स्त्री स्खलित नहीं होती, अत एव मैथुनानन्द का विधि, जो कि विद्वानों को सम्मत (अभीष्ट) है, वह यहाँ भी प्राप्त नहीं होता। इसी अवस्था को सुधारने के लिये उक्त कही जा रही है। योग का प्रयोग किया जाता है। शिरोबस्ति की विधि दुर्गन्धिनाशक योग (1) शिरोबस्तिश्चर्मणः स्याद् द्विमुखो द्वादशाङ्गुलः। ताम्बूलपत्रचूर्णं तु चूर्णं कुष्ठशिवाभवम् ।। 117 ।। शिरःप्रमाणं तं बद्ध्वा मस्तके माषपिष्टकैः ।। 123 ।। वारिणा लेपनं कुर्याद् गात्रदौर्गन्ध्यनाशनम्। सन्धिरोधं विधायादौ स्नेहैः कोष्णैः प्रपूरयेत्। ताम्बूल (पान) के पत्तों का चूर्ण तथा कूठ और हरड़ तावद्धार्यस्तु यावत्स्यान्नासानेत्रमुखस्रुतिः ।। 124 ।। का चूर्ण लेकर जल में पीसकर लेप करने से शरीर की वेदनोपशमो वापि मात्राणां वा सहस्रकम्। दुर्गन्धि का नाश हो जाता है। विना भोजनमेवात्र शिरोबस्तिः प्रशस्यते ।। 125 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA