भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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सुखभोगोंका हेतु तप है। किमधिकं; रावणादिके राज्य, सुख, शक्ति, आयु आदिका मूल भी तप है। श्रीराम तो शुद्ध तपस्वी हैं। वे तपस्वियोंके आश्रममें प्रवेश करते हैं। वहाँ वे वैखानस, बालखिल्य, सम्प्रक्षाल, मरीचिप (केवल चन्द्रकिरण पान करनेवाले), पत्राहारी, उन्मज्जक (सदा कण्ठतक पानीमें डूबकर तपस्या करनेवाले), पञ्चाग्निसेवी, वायुभक्षी, जलभक्षी, स्थण्डिलशायी, आकाशनिलयी एवं ऊर्ध्ववासी (पर्वत-शिखर, वृक्ष, मचान आदिपर रहनेवाले) तपस्वियोंको देखते हैं। ये सभी जपमें लीन थे। (अरण्यकाण्ड ६ठा सर्ग) इनका जप सम्भवतः ‘श्रीराम’ मन्त्र रहा हो, क्योंकि इनमेंसे अधिकांश श्रीरामको देखते ही योगाग्निमें शरीर छोड़ देते हैं। वस्तुतः काव्यविधिसे कान्तासम्मित मधुर वाणीमें वाल्मीकिका यही दार्शनिक उपदेश है। उनका मूल तत्त्व इस प्रकार पवित्रतापूर्वक रहकर तपोऽनुष्ठान करते हुए ईश्वरकी आराधना करना एवं अधर्मसे सदा दूर रहना ही है।

श्रीरामकी परब्रह्मता

कुछ लोग रामायणमें नरचरित्र मानते हैं और श्रीरामके ईश्वरताप्रतिपादक (देखिये, बालकाण्ड १५ से १८ सर्ग, पुनः ७६ । १७, १९, अयोध्या० १ । ७, अरण्य० ३ । ३७, सुन्दर० २५ । २७, ३१; ५१ । ३८, युद्ध० ५९। ११०; ९५ । २५; पूरा १११ तथा ११७ वाँ सर्ग ११९ । १८, ११९ । ३२ में सुस्पष्ट ‘ब्रह्म’ शब्द उत्तरका० ८ । २६, ५१। १२—२२; १०४ । ४ आदि। बङ्ग तथा पश्चिमी शाखामें भी ये सब श्लोक हैं, बल्कि कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक हैं।) हजारों वचनोंको प्रक्षिप्त मानते हैं। किंतु ध्यानसे पढ़नेपर श्रीरामकी ईश्वरता सर्वत्र दीखती है। गम्भीर चिन्तनके बाद तो प्रत्येक श्लोक ही श्रीरामकी अचिन्त्य शक्तिमत्ता, लोकोत्तर धर्मप्रियता, आश्रितवत्सलता एवं ईश्वरताका प्रतिपादक दीखता है। विभीषणशरणागतिके समय यद्यपि कोई भी ऐश्वर्य प्रदर्शक वचन नहीं आया, पर श्रीरामके अप्रतिम मार्दव, कपोतके आतिथ्यसत्कारके उदाहरण देने, परमर्षि कण्डुकी गाथा पढ़ने एवं अपने शरणमें आये समस्त प्राणियोंको* समस्त प्राणियोंसे अभयदान देनेके स्वाभाविक नियमको घोषित करनेके बाद प्रतिवादी सुग्रीवको विवश होकर कहना ही पड़ा कि ‘धर्मज्ञ! लोकनाथोंके शिरोमणि! आपके इस कथनमें कोई आश्चर्य नहीं है; क्योंकि आप महान् शक्तिशाली एवं सत्पथपर आरूढ़ हैं—

किमत्र चित्रं धर्मज्ञ लोकनाथशिखामणे।
यत् त्वमार्य प्रभाषेथाः सत्त्ववान् सत्पथे स्थितः॥

(६ । १८ । ३६)