भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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राज्यारोहणकालमें गङ्गातटपर (बिठूर) रहते थे। वाल्मी० ७। ६६। १ तथा ७। ७१। १४ से भी वाल्मीकाश्रम बिठूरमें ही सिद्ध होता है। अन्य विवरण प्रायः प्रस्तुत ग्रन्थकी टिप्पणियोंमें ही दिये गये हैं।

रामायणमें राजनीति, मनोविज्ञान

वाल्मीकिकी राजनीति बहुत उच्च कोटिकी है। उसके सामने सभी राजनीतिक विचार तुच्छ प्रतीत होते हैं। हनुमान्‌जी तो नीतिकी मूर्ति ही प्रतीत होते हैं। विभीषणके आनेपर श्रीराम सबसे सम्मति माँगते हैं। सुग्रीव कहते हैं कि यह शत्रु‌का ही भाई है, पता नहीं क्यों अब अकस्मात् हमारी सेनामें प्रवेश पाना चाहता है। सम्भव है, अवसर पाकर उल्लू जैसे कौओंका वध कर देता है, वैसे यह हमें भी मार डाले। प्रकृतिसे राक्षस है, इसका क्या विश्वास? साथ ही नीति यह है कि मित्रकी भेजी हुई, मोल ली हुई तथा जंगली जातियोंकी भी सहायता ग्राह्य है, पर शत्रु‌की सहायता तो सदा शंकनीय है। अङ्गदने भी प्रायः ऐसी ही बात कही। जाम्बवन्तने कहा कि हमें भी इसको अदेशकालमें आया देख बड़ी शंका हो रही है। शरभने कहा कि इसपर गुप्तचर छोड़ा जाय। अश्विपुत्र मैन्दने कहा कि इससे प्रश्न-प्रतिप्रश्न किये जायँ, जिसके उत्तरसे भाव जान लिये जायँगे।

पर हनुमान्‌जीने इनका ऐसा खण्डन किया, जो आज भी अभूतपूर्व है। वे बोले—‘प्रभो! आपके समक्ष बृहस्पतिका भाषण भी तुच्छ है। पर आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं विवाद, तर्क, स्पर्धा आदिके कारण नहीं, कार्यकी गुरुताके कारण कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

‘आपके मन्त्रियोंमेंसे कुछने विभीषणके पीछे गुप्तचर लगानेकी राय दी है, पर गुप्तचर तो दूर रहनेवाले तथा ‘अदृष्ट अज्ञातवृत्त’ व्यक्तिके पीछे लगाया जाता है, यह तो प्रत्यक्ष ही सामने है, अपना नाम-काम भी स्वयं ही कह रहा है, यहाँ गुप्तचरका क्या उपयोग? कुछ लोगोंने कहा है कि ‘यह अदेशकालमें आया है’, किंतु मुझे तो लगता है कि यही इसके आनेका देशकाल है। आपके द्वारा वालीको मारा गया और सुग्रीवको अभिषिक्त सुनकर आपके परम शत्रु तथा वालीके मित्र रावणके संहारके लिये ही आया है। इससे प्रश्न करनेकी बात भी दोषयुक्त दीखती है, क्योंकि उससे इसके मैत्रीभावमें बाधा पहुँचेगी और यह मित्रदूषित करनेका कार्य हो जायगा। यों तो आप कुछ भी बात करते समय इसके स्वरभेद, आकार, मुखविक्रिया आदिसे इसकी मनःस्थिति भाँप ही लेंगे। सुतरां मैंने अपनी तुच्छ बुद्धिके अनुसार यह कुछ निवेदन किया, प्रमाण तो स्वयं आप ही हैं।’ इसी तरह उनका लंकाप्रवेशके बाद १३वें सर्गका विमर्श, सीतासे बात करनेके पहले, ‘किस भाषामें किस प्रकार बात करूँ’ इत्यादि परामर्श, पुनः सीतासे बातें कर