श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1300, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपैंतालीसवाँ सर्ग
विभिन्न दिशाओंमें जाते हुए वानरोंका सुग्रीवके समक्ष अपने उत्साहसूचक वचन सुनाना
तदनन्तर वानरशिरोमणि राजा सुग्रीव अन्य समस्त वानरोंको बुलाकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यकी सिद्धिके लिये उन सबसे बोले— ॥ १ ॥
‘कपिवरो! जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार तुम सभी श्रेष्ठ वानरोंको इस जगतमें सीताकी खोज करनी चाहिये।’ स्वामीकी उस कठोर आज्ञाको भलीभाँति समझकर वे सम्पूर्ण श्रेष्ठ वानर टिड्डियोंके दलकी भाँति पृथ्वीको आच्छादित करके वहाँसे प्रस्थित हुए॥ २ १/२ ॥
श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ उस प्रस्रवणगिरिपर ही ठहरे रहे और सीताका समाचार लानेके लिये जो एक मासकी अवधि निश्चित की गयी थी, उसकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ३ १/२ ॥
उस समय वीर वानर शतबलिने गिरिराज हिमालयसे घिरी हुई रमणीय उत्तर दिशाकी ओर शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान किया॥ ४ १/२ ॥
वानर-यूथपति विनत पूर्व दिशाकी ओर गये। कपिगणोंके अधिपति पवनकुमार वानर हनुमान्जी तार और अङ्गद आदिके साथ अगस्त्यसेवित दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुए तथा वानरेश्वर कपिश्रेष्ठ सुषेणने वरुणद्वारा सुरक्षित घोर पश्चिम दिशाकी यात्रा की॥ ५—७ ॥
वानर-सेनाके स्वामी वीर राजा सुग्रीव सम्पूर्ण दिशाओंमें यथायोग्य वानरोंको भेजकर बहुत सुखी हुए और मन-ही-मन हर्षका अनुभव करने लगे॥ ८ ॥
इस तरह राजाकी आज्ञा पाकर समस्त वानरयूथ पति बड़ी उतावलीके साथ अपनी-अपनी दिशाकी ओर प्रस्थित हुए॥ ९ ॥
वे समस्त महाबली वानर और उनके यूथपति अपने राजाके द्वारा इस प्रकार प्रेरित हो भाँति-भाँतिके शब्द करते, उच्च स्वरसे गर्जते, दहाड़ते, किलकारियाँ मारते, दौड़ते और कोलाहल करते हुए कहने लगे— ‘राजन्! हम सीताको साथ लायेंगे और रावणका वध कर डालेंगे। युद्धमें यदि रावण मेरे सामने आ जाय तो मैं अकेला ही उसे मार गिराऊँगा। तत्पश्चात् उसकी सारी सेनाको मथकर कष्ट एवं भयसे काँपती हुई जानकीजीको सहसा यहाँ उठा लाऊँगा। आपलोग यहीं ठहरें। मैं अकेला ही पातालसे भी जनककिशोरीको निकाल लाऊँगा, वृक्षोंको उखाड़ फेकूँगा, पर्वतोंके टुकड़े-टुकड़े कर डालूँगा, पृथ्वीको विदीर्ण कर दूँगा और समुद्रोंको भी