श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकार्य सिद्ध करनेमें आपलोगोंकी समानता करनेवाला कोई नहीं है। आप सभी अपने पुरुषार्थके लिये सभी दिशाओंमें विख्यात हैं। इस समय वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे मुझे आगे करके आपलोग जिस कार्यके लिये निकले थे, उसमें आप और हम सफल न हो सके। ऐसी दशामें हमलोगोंको अपने प्राणोंसे हाथ धोना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है। भला वानरराजके आदेशका पालन न करके कौन सुखी रह सकता है?॥ ११-१२ ॥
‘स्वयं सुग्रीवने जो समय निश्चित किया था, उसके बीत जानेपर हम सब वानरोंके लिये उपवास करके प्राण त्याग देना ही ठीक जान पड़ता है॥ १३ ॥
‘सुग्रीव स्वभावसे ही कठोर हैं। फिर इस समय तो वे हमारे राजाके पदपर स्थित हैं। जब हम अपराध करके उनके पास जायँगे, तब वे कभी हमें क्षमा नहीं करेंगे॥ १४ ॥
‘उलटे सीताका समाचार न पानेपर हमारा वध ही कर डालेंगे, अतः हमें आज ही यहाँ स्त्री, पुत्र, धन-सम्पत्ति और घर-द्वारका मोह छोड़कर मरणान्त उपवास आरम्भ कर देना चाहिये॥ १५१/२ ॥
‘यहाँसे लौटनेपर राजा सुग्रीव निश्चय ही हम सबका वध कर डालेंगे। अनुचित वधकी अपेक्षा यहीं मर जाना हमलोगोंके लिये श्रेयस्कर है॥ १६१/२ ॥
‘सुग्रीवने युवराजपदपर मेरा अभिषेक नहीं किया है। अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाराज श्रीरामने ही उस पदपर मेरा अभिषेक किया है॥ १७१/२ ॥
‘राजा सुग्रीवने तो पहलेसे ही मेरे प्रति वैर बाँध रखा है। इस समय आज्ञा-लङ्घनरूप मेरे अपराधको देखकर पूर्वोक्त निश्चयके अनुसार तीखे दण्डद्वारा मुझे मरवा डालेंगे॥ १८१/२ ॥
‘जीवन-कालमें मेरा व्यसन (राजाके हाथसे मेरा मरण) देखनेवाले सुहृदोंसे मुझे क्या काम है? यहीं समुद्रके पावन तटपर मैं मरणान्त उपवास करूँगा’॥ १९ ॥
युवराज वालिकुमार अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर करुणस्वरमें बोले—॥ २० ॥
‘सचमुच सुग्रीवका स्वभाव बड़ा कठोर है। उधर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रिय पत्नी सीताके प्रति अनुरक्त हैं। सीताको खोजकर लौटनेके लिये जो अवधि निश्चित की गयी थी, वह समय व्यतीत हो जानेपर भी यदि हम कार्य किये बिना ही वहाँ उपस्थित होंगे तो उस अवस्थामें हमें