भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1394

‘इस लंकाके जो वन, उपवन, कानन और मुख्य-मुख्य भवन हैं, उन्हें देखनेके लिये ही यहाँ मेरा आगमन हुआ है’॥ ३४ ॥

हनुमान्‌जीका यह कथन सुनकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली लंका पुनः कठोर वाणीमें बोली— ॥

‘खोटी बुद्धिवाले नीच वानर! राक्षसेश्वर रावणके द्वारा मेरी रक्षा हो रही है। तू मुझे परास्त किये बिना आज इस पुरीको नहीं देख सकता’॥ ३६ ॥

तब उन वानरशिरोमणिने उस निशाचरीसे कहा— ‘भद्रे! इस पुरीको देखकर मैं फिर जैसे आया हूँ, उसी तरह लौट जाऊँगा’॥ ३७ ॥

यह सुनकर लंकाने बड़ी भयंकर गर्जना करके वानरश्रेष्ठ हनुमान्‌को बड़े जोरसे एक थप्पड़ मारा॥ ३८ ॥

लंकाद्वारा इस प्रकार जोरसे पीटे जानेपर उन परम पराक्रमी पवनकुमार कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌ने बड़े जोरसे सिंहनाद किया॥ ३९ ॥

फिर उन्होंने अपने बायें हाथकी अंगुलियोंको मोड़कर मुट्ठी बाँध ली और अत्यन्त कुपित हो उस लंकाको एक मुक्का जमा दिया॥ ४० ॥

उसे स्त्री समझकर हनुमान्‌जीने स्वयं ही अधिक क्रोध नहीं किया। किंतु उस लघु प्रहारसे ही उस निशाचरीके सारे अंग व्याकुल हो गये। वह सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ी। उस समय उसका मुख बड़ा विकराल दिखायी देता था॥ ४१ ॥

अपने ही द्वारा गिरायी गयी उस लंकाकी ओर देखकर और उसे स्त्री समझकर तेजस्वी वीर हनुमान्‌को उसपर दया आ गयी। उन्होंने उसपर बड़ी कृपा की॥

उधर अत्यन्त उद्विग्नरू हुई लंका उन वानरवीर हनुमान्‌से अभिमानशून्य गद्गदवाणीमें इस प्रकार बोली— ॥ ४३ ॥

‘महाबाहो! प्रसन्न होइये। कपिश्रेष्ठ! मेरी रक्षा कीजिये। सौम्य! महाबली सत्त्वगुणशाली वीर पुरुष शास्त्रकी मर्यादापर स्थिर रहते हैं (शास्त्रमें स्त्रीको अवध्य बताया है, इसलिये आप मेरे प्राण न लीजिये)॥

‘महाबली वीर वानर! मैं स्वयं लंकापुरी ही हूँ, आपने अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर दिया है॥ ४५ ॥