श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवापस चलनेके समय दूतादिके कर्तव्य एवं लङ्काके बलाबलकी जानकारीके लिये किया गया ऊहापोह, सुग्रीवको भोगलिप्त देखकर दिया गया परामर्श तथा रावणको जो उपदेश किया है, उसमें इनकी अपूर्व नीतिमत्ता, रामभक्ति, विचारप्रवणता, साधुता तथा अप्रतिम बुद्धिमत्ता प्रकट होती है। इन्हीं सब कारणोंसे उन्हें— ‘बुद्धिमतां वरिष्ठम्’ कहा गया है। स्वयं श्रीराम भी बार-बार इनके भाषणचातुर्य, बुद्धिकौशलपर चकित होते हैं (किष्किन्धा० ४। २५—३५; युद्धकाण्ड १)। श्रीरामकी नीतिमत्ता, साधुता, सद्गुणसम्पन्नता तो सर्वोपरि है ही। श्रीलक्ष्मण भी कम नहीं हैं। वे मारीचको पहले ही राक्षस बतलाकर सावधान करते हैं। सीतासे बार-बार कहते हैं कि ‘श्रीरामपर कोऽइ संकट नहीं है, आपपर ही संकट आया दीखता है। यह सब राक्षसोंकी माया है’ इत्यादि। इसी प्रकार विभीषण आदिकी बातें भी स्थान-स्थानपर देखते बनती हैं।
उपसंहार
इन सभी गुणोंके आकर होनेसे ही यह काव्य सर्वाधिक लोकप्रिय, अजर, अमर, दिव्य तथा कल्याणकर^{१२} है। संतोंके शब्दोंमें यह ‘रामायण श्रीरामतनु’ है। इसका पठन, मनन, अनुष्ठान साक्षात् प्रभु श्रीरामका संनिधान प्राप्त करना है।^{१३} हनुमान्जीकी प्रसन्नताके लिये इस श्रीरामचरितके गानसे बढ़कर दूसरा उपाय नहीं। (इसमें हनुमच्चरित्र भी निरुपम, उज्ज्वल तथा दिव्य है।) इसलिये अनादिकालसे इसके श्रवण-पठन-अनुष्ठानादिकी परम्परा है। रामलीलाका भी पहले यही आधार रहा। हम पहले यदुवंशियोंद्वारा हरिवंशमें वर्णित रामायणनाटक खेलनेका उल्लेख कर चुके हैं। वहाँ इसका बड़ा रोचक वर्णन है। जब सुपुरमें इन्हें सफलता मिली तो वज्रनाभके वज्रपुरमें भी बुलाया गया। वहाँ इन्होंने लोमपादद्वारा श्रृङ्ग ऋषिका आनयन, पुनः दशरथ-यज्ञ, गङ्गावतरण, रम्भाभिसार आदि नाटक खेले।
रामायणं महाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम्।
लोमपादो दशरथ ऋष्यशृङ्गं महामुनिम्॥
शान्तामप्यानयामास गणिकाभिः सहानघ।
(२। ९३। ८)
लयतालसमं श्रुत्वा गङ्गावतरणं शुभम्।
(२। ९३। २५)
यहाँ प्रद्युम्न, गद एवं साम्ब नान्दी बाजा बजा रहे थे। (नगाड़ोंकी ध्वनिको ही यहाँ नान्दी कहा गया है।) शूर नामके यादव ही ‘रावण’ का नाटक खेल रहे थे। (श्लोक २८) प्रद्युम्न