भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 146

“राजाके ऐसा कहनेपर वे वेदोंके पारंगत विद्वान्—सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें इस प्रकार सलाह देंगे—॥

‘राजन्! विभाण्डकके पुत्र ऋष्यशृंग वेदोंके पारगामी विद्वान् हैं। भूपाल! आप सभी उपायोंसे उन्हें यहाँ ले आइये। बुलाकर उनका भलीभाँति सत्कार कीजिये। फिर एकाग्रचित्त हो वैदिक विधिके अनुसार उनके साथ अपनी कन्या शान्ताका विवाह कर दीजिये’॥ १२-१३ ॥

उनकी बात सुनकर राजा इस चिन्तामें पड़ जायँगे कि किस उपायसे उन शक्तिशाली महर्षिको यहाँ लाया जा सकता है॥ १४ ॥

“फिर वे मनस्वी नरेश मन्त्रियोंके साथ निश्चय करके अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको सत्कारपूर्वक वहाँ भेजेंगे॥ १५ ॥

“राजाकी बात सुनकर वे मन्त्री और पुरोहित मुँह लटकाकर दुःखी हो यों कहने लगेंगे कि ‘हम महर्षिसे डरते हैं, इसलिये वहाँ नहीं जायँगे।’ यों कहकर वे राजासे बड़ी अनुनय-विनय करेंगे॥ १६ ॥

‘इसके बाद सोच-विचारकर वे राजाको योग्य उपाय बतायेंगे और कहेंगे कि ‘हम उन ब्राह्मणकुमारको किसी उपायसे यहाँ ले आयेंगे। ऐसा करनेसे कोई दोष नहीं घटित होगा’॥ १७ ॥

“इस प्रकार वेश्याओंकी सहायतासे अंगराज मुनिकुमार ऋष्यशृंगको अपने यहाँ बुलायेंगे। उनके आते ही इन्द्रदेव उस राज्यमें वर्षा करेंगे। फिर राजा उन्हें अपनी पुत्री शान्ता समर्पित कर देंगे॥ १८ ॥

“इस तरह ऋष्यशृंग आपके जामाता हुए। वे ही आपके लिये पुत्रोंको सुलभ करानेवाले यज्ञकर्मका सम्पादन करेंगे। यह सनत्कुमारजीकी कही हुई बात मैंने आपसे निवेदन की है”॥ १९ ॥

यह सुनकर राजा दशरथको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुमन्त्रसे कहा—‘मुनिकुमार ऋष्यशृंगको वहाँ जिस प्रकार और जिस उपायसे बुलाया गया, वह स्पष्टरूपसे बताओ’॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें नवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

९॥