भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1703, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1703

‘महाराज! यदि यह बात मैंने मोह या लोभसे कही हो तो भी आपको मुझमें दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये॥

‘सीताका अपहरण तथा इससे होनेवाला अपशकुनरूपी दोष यहाँकी सारी जनता, राक्षस-राक्षसी तथा नगर और अन्तःपुर—सभीके लिये उपलक्षित होता है॥ २४ ॥

‘यह बात आपके कानोंतक पहुँचानेमें प्रायः सभी मन्त्री संकोच करते हैं; परंतु जो बात मैंने देखी या सुनी है वह मुझे तो आपके आगे अवश्य निवेदन कर देनी चाहिये; अतः उसपर यथोचित विचार करके आप जैसा उचित समझें, वैसा करें’॥ २५ ॥

इस प्रकार भार्‍इ विभीषणने अपने मन्त्रियोंके बीचमें बड़े भार्‍इ राक्षसराज रावणसे ये हितकारी वचन कहे॥ २६ ॥

विभीषणकी ये हितकर, महान् अर्थकी साधक, कोमल, युक्तिसंगत तथा भूत, भविष्य और वर्तमानकालमें भी कार्यसाधनमें समर्थ बातें सुनकर रावणको बुखार चढ़ आया। श्रीरामके साथ वैर बढ़ानेमें उसकी आसक्ति हो गयी थी। इसलिये उसने इस प्रकार उत्तर दिया—‘विभीषण! मैं तो कहींसे भी कोर्‍इ भय नहीं देखता। राम मिथिलेशकुमारी सीताको कभी नहीं पा सकते। इन्द्रसहित देवताओंकी सहायता प्राप्त कर लेनेपर भी लक्ष्मणके बड़े भार्‍इ राम मेरे सामने संग्राममें कैसे टिक सकेंगे?’॥ २७-२८ ॥

ऐसा कहकर देवसेनाके नाशक और समराङ्गणमें प्रचण्ड पराक्रम प्रकट करनेवाले महाबली दशाननने अपने यथार्थवादी भार्‍इ विभीषणको तत्काल विदा कर दिया॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

१० ॥