भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 1705

उस समय राक्षसराज रावणके ऊपर तना हुआ निर्मल श्वेत छत्र पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पा रहा था॥ १०१/२ ॥

उसके दाहिने और बायें भागमें शुद्ध स्फटिकके डंडेवाले चँवर और व्यजन, जिनमें सोनेकी मञ्जरियाँ बनी हुई थीं, बड़ी शोभा पा रहे थे॥ १११/२ ॥

मार्गमें पृथ्वीपर खड़े हुए सभी राक्षस दोनों हाथ जोड़ रथपर बैठे हुए राक्षसशिरोमणि रावणकी सिर झुकाकर वन्दना करते थे॥ १२१/२ ॥

राक्षसोंद्वारा की गयी स्तुति, जय-जयकार और आशीर्वाद सुनता हुआ शत्रुदमन महातेजस्वी रावण उस समय विश्वकर्माद्वारा निर्मित राजसभामें पहुँचा॥ १३१/२ ॥

उस सभाके फर्शमें सोने-चाँदीका काम किया हुआ था तथा बीच-बीचमें विशुद्ध स्फटिक भी जड़ा गया था। उसमें सोनेके कामवाले रेशमी वस्त्रोंकी चादरें बिछी हुई थीं। वह सभा सदा अपनी प्रभासे उद्भासित होती रहती थी। छः सौ पिशाच उसकी रक्षा करते थे। विश्वकर्माने उसे बहुत ही सुन्दर बनाया था। अपने शरीरसे सुशोभित होनेवाले महातेजस्वी रावणने उस सभामें प्रवेश किया॥ १४-१५१/२ ॥

उस सभाभवनमें वैदूर्यमणि (नीलम)-का बना हुआ एक विशाल और उत्तम सिंहासन था, जिसपर अत्यन्त मुलायम चमड़ेवाले ‘प्रियक’ नामक मृगका चर्म बिछा था और उसपर मसनँद भी रखा हुआ था। रावण उसीपर बैठ गया। फिर उसने अपने शीघ्रगामी दूतोंको आज्ञा दी—॥ १६-१७ ॥

‘तुमलोग शीघ्र ही यहाँ बैठनेवाले सुविख्यात राक्षसोंको मेरे पास बुला ले आओ; क्योंकि शत्रुओंके साथ करनेयोग्य महान् कार्य मुझपर आ पड़ा है। इस बातको मैं अच्छी तरह समझ रहा हूँ (अतः इसपर विचार करनेके लिये सब सभासदोंका यहाँ आना अत्यन्त आवश्यक है)’॥ १८ ॥

रावणका यह आदेश सुनकर वे राक्षस लङ्कामें सब ओर चक्कर लगाने लगे। वे एक-एक घर, विहारस्थान, शयनागार और उद्यानमें जा-जाकर बड़ी निर्भयतासे उन सब राक्षसोंको राजसभामें चलनेके लिये प्रेरित करने लगे॥ १९ ॥

तब उन राक्षसोंमेंसे कोई रथपर चढ़कर चले, कोई मतवाले हाथियोंपर और कोई मजबूत घोड़ोंपर सवार होकर अपने-अपने स्थानसे प्रस्थित हुए। बहुत-से राक्षस पैदल ही चल दिये॥ २० ॥