भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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तैंतालीसवाँ सर्ग

द्वन्द्वयुद्धमें वानरोंद्वारा राक्षसोंकी पराजय

तदनन्तर परस्पर युद्ध करते हुए महामना वानरों और राक्षसोंको एक-दूसरेकी सेनाको देखकर बड़ा भयंकर रोष हुआ॥ १ ॥

सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ों, हाथियों, अग्निकी ज्वालाके समान देदीप्यमान रथों तथा सूर्यतुल्य तेजस्वी मनोरम कवचोंसे युक्त वे वीर राक्षस दसों दिशाओंको अपनी गर्जनासे गुँजाते हुए निकले। भयानक कर्म करनेवाले वे सभी निशाचर रावणकी विजय चाहते थे॥ ३-४ ॥

भगवान् श्रीरामकी विजय चाहनेवाले वानरोंकी उस विशाल सेनाने भी घोर कर्म करनेवाले राक्षसोंकी सेनापर धावा किया॥ ४ ॥

इसी समय एक-दूसरेपर धावा बोलते हुए राक्षसों और वानरोंमें द्वन्द्वयुद्ध छिड़ गया॥ ५ ॥

वालिपुत्र अङ्गदके साथ महातेजस्वी राक्षस इन्द्रजित् उसी तरह भिड़ गया, जैसे त्रिनेत्रधारी महादेवजीके साथ अन्धकासुर लड़ रहा हो॥ ६ ॥

प्रजङ्घ नामक राक्षसके साथ सदा ही रणदुर्जय वीर सम्पातिने और जम्बुमालीके साथ वानर वीर हनुमान्‌जीने युद्ध आरम्भ किया॥ ७ ॥

अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए रावणानुज राक्षस विभीषण समराङ्गणमें प्रचण्ड वेगशाली शत्रुघ्नके साथ उलझ गये॥ ८ ॥

महाबली गज तपन नामक राक्षसके साथ लड़ने लगे। महातेजस्वी नील भी निकुम्भसे जूझने लगे॥ ९ ॥

वानरराज सुग्रीव प्रघसके साथ और श्रीमान् लक्ष्मण समरभूमिमें विरूपाक्षके साथ युद्ध करने लगे॥

दुर्जय वीर अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप—ये सब राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके साथ जूझने लगे॥ ११ ॥

मैन्दके साथ वज्रमुष्टि और द्विविदके साथ अशनिप्रभ युद्ध करने लगे। इस प्रकार इन दोनों भयानक राक्षसोंके साथ वे दोनों कपिशिरोमणि वीर भिड़े हुए थे॥ १२ ॥