श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 1878, कुल 2621 में से
संदर्भ में पढ़ेंपचपनवाँ सर्ग
रावणकी आज्ञासे अकम्पन आदि राक्षसोंका युद्धमें आना और वानरोंके साथ उनका घोर युद्ध
वालिपुत्र अङ्गदके हाथसे वज्रदंष्ट्रके मारे जानेका समाचार सुनकर रावणने हाथ जोड़कर अपने पास खड़े हुए सेनापति प्रहस्तसे कहा— ॥ १ ॥
‘अकम्पन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता हैं, अतः उन्हींको आगे करके भयंकर पराक्रमी दुर्धर्ष राक्षस शीघ्र यहाँसे युद्धके लिये जायँ॥ २ ॥
‘अकम्पनको युद्ध सदा ही प्रिय है। ये सर्वदा मेरी उन्नति चाहते हैं। इन्हें युद्धमें एक श्रेष्ठ योद्धा माना गया है। ये शत्रुओंको दण्ड देने, अपने सैनिकोंकी रक्षा करने तथा रणभूमिमें सेनाका संचालन करनेमें समर्थ हैं॥ ३ ॥
‘अकम्पन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको तथा महाबली सुग्रीवको भी परास्त कर देंगे और दूसरे-दूसरे भयानक वानरोंका भी संहार कर डालेंगे, इसमें संशय नहीं है’॥ ४ ॥
रावणकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके शीघ्र-पराक्रमी महाबली सेनाध्यक्षने उस समय युद्धके लिये सेना भेजी॥ ५ ॥
सेनापतिसे प्रेरित हो भयानक नेत्रोंवाले मुख्य-मुख्य भयंकर राक्षस नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये नगरसे बाहर निकले॥ ६ ॥
उसी समय तपे हुए सोनेसे विभूषित विशाल रथपर आरूढ़ हो घोर राक्षसोंसे घिरा हुआ अकम्पन भी निकला। वह मेघके समान विशाल था, मेघके समान ही उसका रंग था और मेघके ही तुल्य उसकी गर्जना थी॥ ७ १/२ ॥
महासमरमें देवता भी उसे कम्पित नहीं कर सकते थे, इसीलिये वह अकम्पन नामसे विख्यात था और राक्षसोंमें सूर्यके समान तेजस्वी था॥ ८ १/२ ॥
रोषावेशसे भरकर युद्धकी इच्छासे धावा करनेवाले अकम्पनके रथमें जुते हुए घोड़ोंका मन अकस्मात् दीनभावको प्राप्त हो गया॥ ९ १/२ ॥
यद्यपि अकम्पन युद्धका अभिनन्दन करनेवाला था, तथापि उस समय उसकी बायीं आँख फड़कने लगी। मुखकी कान्ति फीकी पड़ गयी और वाणी गद्गद हो गयी॥